भिवानी। थैलेसीमिया एक रक्त विकार यानी क्रोनिक ब्लड डिसऑर्डर है। यह एक आनुवांशिक विकार है। इसके कारण मरीज के लाल रक्त कण यानी आरबीसी में पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है। इस कारण एनीमिया हो जाता है और रोगियों को जीवित रहने के लिए हर 15 दिन बाद रक्त की आवश्यकता होती है।
जिले में थैलेसीमिया के 65 मरीज उपचार ले रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार माता-पिता के जरिये यह बीमारी बच्चों में पहुंचती है। इस कारण एक साल से कम उम्र के बच्चों के विकास व गतिविधि को अभिभावक नोट करते रहें। अगर किसी प्रकार का संशय लगता है तो तुरंत अपने नजदीकी बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श जरूर करें।
सभी थैलेसीमिया मरीजों का इलाज जिला नागरिक अस्पताल में चल रहा है। अस्पताल में थैलेसीमिया मरीजों के लिए अलग से वार्ड बनाया गया है। वार्ड में चार बेड लगाए गए हैं। वार्ड में मरीजों को सभी दवा व सुविधा निशुल्क दी जा रही हैं। वहीं स्वास्थ्य विभाग की तरफ से भी लोगों को जागरूक करने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।
थैलेसीमिया के कारण
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रोग है। यह विकार माता-पिता या दोनों के जींस में गड़बड़ी के कारण होता है। रक्त में हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है। पहला अल्फा और दूसरा बीटा ग्लोबिन। दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जींस में गड़बड़ी होने पर थैलेसीमिया रोग होता हैं।
थैलेसीमिया बीमारी को तीन चरणों में समझें
मेजर थैलेसीमिया : यह बीमारी ऐसे बच्चों में देखी जाती है। इसके माता व पिता दोनों थैलेसीमिया माइनर हैं। ऐसे बच्चे को मेजर थैलेसीमिया होने का खतरा अधिक रहता है।
माइनर थैलेसीमिया : यह बीमारी ऐसे बच्चों को होती है। जिन्हें प्रभावित जींस माता या पिता द्वारा प्राप्त होता है। इस प्रकार से पीड़ित थैलेसीमिया के रोगियों में कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है। लेकिन ये रोगी थैलेसीमिया वाहक होते हैं।
हाइड्रो फीटस : यह सबसे खतरनाक थैलेसीमिया होता है। ऐसी स्थिति में गर्भ के अंदर ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है या पैदा होने के कुछ समय बाद ही बच्चा मर जाता है।
थैलेसीमिया के लक्षण
माइनर थैलेसीमिया : थैलेसीमिया का कोई सटीक लक्षण नहीं बता सकतें। लेकिन कुछ मामलों में रक्त की कमी या एनीमिया हो सकता है। ऐसे मरीज माइनर थैलेसीमिया से प्रभावित होते हैं।
मेजर थैलेसीमिया : मेजर थैलेसीमिया कि स्थिति में जन्म लेने के तीन महीने बाद तक भी बच्चों में लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। लेकिन कुछ मरीजों में बच्चों का विकास रुक जाता है। अपनी उम्र के अनुसार बाकी बच्चों की तुलना में कमजोर दिखाई देता है। वजन नहीं बढ़ रहा है। कमजोरी व सांस लेने में परेशानी होना ऐसे लक्षण मिलने पर उसे मेजर थैलेसीमिया हो सकता है।
थैलेसीमिया का समाधान
थैलेसीमिया मरीजों के इलाज के लिए हर 15 दिन में खून चढ़ाने की जरूरत रहती है। वहीं कुछ मरीज इसका खर्चा नहीं उठा पाते हैं। इस कारण छोटी उम्र में ही बच्चों की मृत्यु हो जाती है। जैसे-जैसे मरीजों की उम्र बढ़ती है तो खून की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। इसके समाधान के लिए शरीर में खून की कमी न रहने दें। अगर एक साल से कम उम्र के बच्चे में विकास रूक जाता है। खाना-पीना कम करता है। वजन नहीं बढ़ रहा है। ऐसी अवस्था में अपने नजदीकी चिकित्सक से परामर्श जरूर करें।
सामाजिक संस्थाएं भी खून उपलब्ध करवाने में कर रहीं सहयोग
जिले की सामाजिक संस्थाएं भी रक्तदान शिविर लगाकर मरीजों के लिए खून की पूर्ति कर रही हैं। अस्पताल में कार्यरत स्टाफ ने बताया कि डेंगू सीजन के समय रक्त की कमी हो जाती है। लेकिन सामाजिक संस्था लगातार रक्तदान शिविर का आयोजन करते रहते हैं। इस कारण मरीजों के लिए हर समय वार्ड में खून आसानी से मिल जाता है।
थैलेसीमिया के मरीजों को पैनिक होने की जरूरत नहीं है। लेकिन समय से देखभाल करने की जरूरत रहती है। थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रोग है। इस कारण बच्चे के पेट में होने पर ही जांच अवश्य करवा लें। अगर जन्म के बाद बच्चे के अंदर थैलेसीमिया से संबंधित लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरंत अपने नजदीकी नागरिक अस्पताल में इलाज शुरू करें। - डॉ. रीटा सिसोदिया, बाल रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज भिवानी।