आत्म उत्थान के लिए होता है अलौकिक पर्व: अनुपम मुनि
भिवानी
जैन धर्म में पर्व के दो विभाजन है। जैसे लौकिक पर्व और अलौकिक पर्व। लौकिक पर्व उसे कहते हैं जो बाह्य तरीके से मनाया जाता है। अलौकिक पर्व आत्म उत्थान के लिए होता है। ये विचार जैन मुनि अनुपम ने पुराना हाउसिंग बोर्ड स्थित जैन स्थानक में चल रहे अपने चातुर्मास के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जैसे होली, दशहरा, दीपावली, रक्षा बंधन आदि जो देवी देवताओं की पूजा बाह्य तरीकों से मनाया जाता है। ये सब पर्व लौकिक है। इन पर्वों से परस्पर में भाईचारा सौहार्द और खुशहाली आती है। लेकिन अलौकिक पर्व आत्म उत्थान के लिए होता है। इसमें मनुष्य अपनी आत्मा का सुधार या उत्थान करने के लिए जप-तप व्रत, नियम पचम्खान, साधना-अराधना, ध्यान, मौन, उपवास, आयम्बिल, एकासना, स्वाध्याय आदि कर अपनी आत्मा को जगाता है। इससे इस लोक में और परलोक में आत्मा का सुधार होता है। अर्थात कल्याण होता है। जिसमें मनुष्य अपनी आत्मा को जागृत करता है और अपने आप को अपने आप के लगने वाले पापों से निवृत होकर अपनी आत्मा को शुद्ध करता है। पर्वाधिराज पर्व पर्यूषण का मतलब है। अपनी आत्मा को पाप की प्रवृति से हटाकर परमात्मा में या अपने आप में प्रवृत्त करना, लगाए रखना। अपने आप में निकट रहना यही तो पर्युषण पर्व है। जैन मुनि ने कहा कि जैन धर्मा अनुयायी पर्यूषण पर्व का ध्यान इस प्रकार करते है।