पंचायत चुनावों में इस बार 177 महिलाओं के हाथों में गांवों की चौधर होगी। महिला सशक्तिकरण के इस दौर में आंकड़ा बेशक काफी बढिय़ा है, लेकिन महिलाओं के लिए राह आसान नहीं दिख रही है, लेकिन फिर भी जिस तरह से मतदाताओं ने महिलाओं को चौधराहट का मौका दिया है, उससे उम्मीद की जा रही है लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ने दिखा दिया कि मतदाता महिलाओं पर भरोसा करने लगा है। बेशक आंकड़ा महिला आरक्षित सीटों का भी हो, लेकिन फिर भी महिलाओं ने उस मौके को बखूबी भुनाया, जिसके लिए सरकार ने एक प्लेटफार्म तैयार कर दिया।
सरकार ने इस बार पंचायत चुनावों में शिक्षा की शर्त लगा दी, जिसके चलते कई उम्मीदवार इस रेस से ही बाहर हो गए। लेकिन इसी शर्त ने उन महिलाओं के लिए रास्ता खोल दिया, जो पढ़ी लिखी थी और सरकार द्वारा रखी गई इस शर्त को पूरा करती थी। बस जो उम्मीदवार इस रेस से बाहर हुए, उनकी जगह उनके परिवार या रिश्तेदारी में महिलाओं ने इस बार मैदान में उतरने का फैसला लिया। यही फैसला उनके पक्ष में भी जाता दिखा, जब मतदाताओं ने गांवों की चौधर महिलाओं को सौंप दी।
ब्लॉक के अनुसार पुरुष और महिला चौधरियों की स्थिति
ब्लॉक बराड़ा की 66 पंचायतों में से 37 पंचायतों में पुरुष, 29 पंचायतों में महिलाएं सरपंच बनीं। इसी तरह ब्लाक साहा की 60 पंचायतों में से 36 पंचायतों में पुरुष और 24 पंचायतों में महिलाएं सरपंच बनीं।
इसी तरह अंबाला-1 ब्लाक की 101 पंचायतों में से 55 पंचायतों पर पुरुषों व 46 पंचायतों पर महिलाओं का कब्जा रहा, जबकि अंबाला-2 ब्लाल की 27 पंचायतों में से 18 पंचायतों पर पुरुषों व 9 पंचायतों पर महिलाओं का कब्जा रहा।
दूसरी ओर शहजादपुर ब्लॉक की 68 पंचायतों में से 34 गांवों की चौधर जहां पुरुषों को मिली, वहीं 34 गांवों की कमान महिलाओं के हाथों में है। इसी प्रकार नारायणगढ़ ब्लॉक की 86 पंचायतों में से 51 गांवों की चौधर जहां पुरुषों को मिली, वहीं 35 गांवों की कमान महिलाओं के हाथों में है।
408 पंचायत एक भी अल्पसंख्यक चौधरी नहीं
जिला अंबाला की 408 पंचायतों में अल्पसंख्यक वर्ग से एक भी चौधरी नहीं बना। लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई के इस चुनावों में अल्पसंख्यकों को बतौर सरपंच प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। हालांकि इस वर्ग की गांवों में वोटें तो हैं, लेकिन सभी 408 गांवों में अल्पसंख्यक वर्ग को प्रतिनिधित्व की तलाश है। मतदाता इस बारे में कुछ कह नहीं रहे, लेकिन फिर भी अल्पसंख्यक वर्ग के लिए बतौर सरपंच इस बार झोली खाली ही रही।