अंबाला। अहोई अष्टमी के व्रत को लेकर बुधवार को छावनी की पुरानी सब्जी मंडी, हलवाई बाजार, हिल रोड के बाजारों में रौनक लगी रही। लोग सुबह से ही बाजारों में गन्ना, मूली, सिंघाड़ा और फलों की खरीदारी करते नजर आए। इस दौरान फलों के रेट पहले के मुकाबले तेजी रही।
इस दौरान सेब 80 से लेकर 200 रुपये प्रति किलोग्राम, केला 80 रुपये दर्जन, मौसमी 80 रुपये किलोग्राम, अनार 160 रुपये, 250 रुपये, अमरुद 120 रुपये, अनानास 120 रुपये, सिंघाड़ा 80 रुपये, गन्ना 30 रुपये पीस और मूली 50 रुपये किलो के भाव से बिक्री होता दिखा। अहोई अष्टमी के व्रत में अहोई माता की पूजा की जाती है।
इस दिन महिलाएं अपनी संतान के लिए निर्जला व्रत करती हैं ओर शाम को तारों की छांव में कथा सुनकर तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। कई जगह तारे निकलने के बाद अहोई माता की पूजा शुरू होती है। पूजन से पहले पूजा वाली जगह को साफ करके पूजा का चौक पूरकर एक लोटे में जल भरकर उसे कलश की तरह चौकी के एक कोने पर रखते हैं।
इसके बाद पूजा की जाती है। इसके बाद महिलाएं अहोई अष्टमी व्रत की कथा सुनतीं हैं। दुकानदार विक्की ने बताया कि बाजार में झकरा-झकरी 90 से 100 रुपये मिल रहे हैं। इसके अलावा रंगीन वाले झकरा-झकरी 200 रुपये तक में हैं। वहीं माता का कैलेंडर 10 रुपये में उपलब्ध है।
बढ़ रहा पूजा का बजट
अंबाला शहर निवासी प्रियंका ने बताया कि बीते वर्षों में महंगाई बहुत बढ़ गई है। त्योहार आते ही घर का बजट बिगड़ जाता है। पिछली बार सिंघाड़ा और गन्ने के रेट कम थे। इस बार रेट बहुत ज्यादा बढ़े हुए हैं।
फलों के दामों में आई तेजी
छावनी निवासी पिंकी ने बताया कि वह पिछले तेरह साल से व्रत रखती आ रही हैं। इन 13 साल में फलों के रेट तीन गुना बढ़ चुके हैं। जो सेब पहले 30 से 40 रुपये में मिलता था अब वह 80 से 200 रुपये में मिल रहा है।
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कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है अहोई अष्टमी का व्रत
अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। पंडित प्रवेश उनियाल बताते हैं कि इस दिन पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं, और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय अहोई माता का पूजन किया जाता है।
तारों को करवा से अर्ध्य भी दिया जाता है। यह अहोई गेरू आदि के द्वारा दीवार पर बनाई जाती है, अथवा किसी मोटे वस्त्र पर अहोई काढ़ कर पूजा के समय उसे दीवार पर टांग दिया जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घ आयु के लिए रखती हैं। इस दिन धोबी मारन लीला का भी मंचन होता है, जिसमें श्री कृष्ण की ओर से कंस के भेजे धोबी का वध प्रदर्शन किया जाता है।
उन्होंने बताया कि अहोई माता के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास सेह तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं।
उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अहोई माता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। संपन्न घर की महिलाएं चांदी की अहोई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोई माता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात् एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है।
अहोई अष्टमी को लेकर छावनी के बाजारों में पूजा के सामान की खरीदारी करते लोग।