संवाद न्यूज एजेंसी
अंबाला। छावनी के श्री सनातन धर्म मंदिर में सभा की ओर से के पितृ उद्धार हेतु संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ किया जा रहा है। कथा के चौथे दिन श्रीराम मुद्रगल शास्त्री ने प्रह्लाद चरित्र का वर्णन किया और प्रभु भक्ति की महिमा बताई।
उन्होंने कहा कि अगर भक्त सच्चा हो तो विपरीत परिस्थितियां भी कोई उसे भगवान की भक्ति से विमुख नहीं कर सकता। भगवत कृपा प्राप्ति के लिए प्रभु नाम का सुमिरन एक अमोघ साधन है। पापी दुरात्मा अजामिल ने नारायण नाम के उच्चारण मात्र से भगवत कृपा अनुभव कर कालांतर में विष्णु लोक प्राप्त किया।
श्रीमद्भागवत में भगवान यह बताते है कि मैं अजन्मा होते हुए भी प्रकट हो जाता हूं। प्रकट होना और अंतर्धान होना, दोनों ही मेरी अलौकिक लीलाएं हैं। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान के अवतार ग्रहण का प्रयोजन है। माता देवकी और वासुदेव के घर भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ। माता देवकी ने कहा, विश्वात्मन शंख,चक्र, गदा और पदम की शोभा से युक्त इसे चार भुजाओं वाले अपने अलौकिक दिव्य रूप को अब छिपा लीजिए। तब भगवान ने माता-पिता के देखते-देखते अपनी माया से तत्काल शिशु का रूप धारण किया।
भगवान का वासुदेव द्वारा नंद बाबा के घर जाना और वहां पर श्रीकृष्ण के जन्म पर सभी का खुश होना और मंगल गीत गाना। इस अवसर पर सभा के प्रधान प्रो. तारा चंद गुप्ता, सभा महासचिव सुधीर विंदलस, कोषाध्यक्ष अशोक सिंगला, कैलाश मल्होत्रा, सहायक सचिव संजय गुप्ता आदि ने श्रीराम मुद्रगल शास्त्री को पुष्प हार भेंट कर उनका अभिनंदन किया।