अंबाला। बेड़ियों के साथ ट्रैक पर मिले युवक के शव के बाद वीरवार को प्रदेश के तीन दिग्गज कांग्रेसी पीड़ितों के घर मरहम लगाने पहुंचे। नेताओं के दौरे के साथ ही ‘सियासी सहानुभूति’ के साथ-साथ ‘दलित अत्याचार’ की राजनीति तेज हो गई है।
पुलिस प्रशासन पर भी इतना ज्यादा दबाव बढ़ गया कि पुलिस को आरोपी पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ एससी एक्ट की धाराएं भी जोड़नी पड़ी।
कुमारी सैलजा ने स्वीकार किया कि पुलिस ने तो पहले दलित अत्याचार से संबंधित धाराएं ही एफआईआर में नहीं लगाई थी, बल्कि उन्होंने खुद कहकर एससी, एसटी एक्ट की धाराएं जुड़वाई है।
इतना ही नहीं मृतक परिवार और दूसरे युवक के पीड़ित परिवार वालों के समर्थकों ने अभी तक प्रदर्शन व हंगामे के तहत प्रशासन व सरकार से मुआवजा देने की मांग जरूर की थी, लेकिन तीन दिन तक पीड़ितों के परिजनों को नौकरी दिए जाने का भी मुद्दा कहीं नहीं था। मगर सैलजा ने अपनी सहानुभूति दिखाते हुए प्रदेश सरकार से मांग कर डाली कि पीड़ित परिवारों में से एक परिजन को नौकरी दें, केवल 5 लाख मुआवजे से कुछ नहीं होगा। सैलजा ने अपने बयान में इस मुआवजे को मात्र ‘मूंगफली’ की संज्ञा दे डाली।
उधर, विनोद शर्मा और मुलाना ने भी मुआवजा राशि बढ़ाकर दलितों के प्रति सरकारी सहानुभूति दिखाई। हालांकि ये क्षेत्र विधायक विनोद शर्मा का क्षेत्र था, मगर विनोद शर्मा प्रदेशाध्यक्ष मुलाना को दलित नेता होने के नाते अपने साथ रविदास बस्ती ले गए और वहां उन्होंने सभी के सामने कहा कि प्रदेश सरकार 2 लाख नहीं दलित परिवार को 5 लाख मुआवजा देगी, मुख्यमंत्री जी से इस बारे में बात हो चुकी है।
खैर, नेताओं की ये सियासी सहानुभूति पूरा दिन इलाके में चरचा का विषय बनी रही।