अंबाला। पद्मा एकादशी व्रत कथा के बारे में पंडित प्रवेश उनियाल ने बताया कि एकादशी व्रत की कथा पढ़ने और श्रवण करने वालों को हजार अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है इसकी विधि तथा इसका महत्व क्या है?
तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का महत्व मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो। यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं।
अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें। जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वह अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। इसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।
यह एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं।
भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान मुझे अति संदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं, चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है।
आप मुझसे विस्तार से बताइए। श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।