केंद्र व राज्य सरकार जब तक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमियों की समस्याओं की ओर ध्यान और उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करेगी तब तक मोदी सरकार का मेक इन इंडिया का सपना पूरा नहीं होगा। हर वर्ग के उद्यमियों की कई ऐसी समस्याएं हैं, जिस पर आज निराकरण बहुत जरूरी है, लेकिन सरकार आज अपनी देश की इंडस्ट्री को संभालने और संवारने की बजाए, विदेशी निवेश के पीछे दौड़ रही है। उक्त बात अंबाला के फोनिक्स क्लब में आयोजित 'अमर उजाला' की एमएसएमई कानक्लेव के दौरान विभिन्न वर्ग के उद्यमियों ने प्रमुखता से रखी।
उद्यमियों ने की खुलकर चर्चा
इस कानक्लेव में विश्वविख्यात साइंस इंडस्ट्री, लैदर इंडस्ट्री, फार्मा इंडस्ट्री व मिक्सी इंडस्ट्री से जुड़े कई कारोबारी मौजूद रहे। सभी उद्यमियों ने अपनी-अपनी इंडस्ट्री की समस्याओं, समाधानों और सुझावों पर खुलकर चर्चा की। कानक्लेव में साइंसटिफिक अप्रैटस एंड मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (सामा) के प्रधान ज्ञानचंद अग्रवाल, दि साइंसटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स एंड मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन (असीमा) के प्रधान राकेश गुप्ता, पूर्व प्रधान अश्वनी गोयल, पूर्व प्रधान अमरजीत सिंह, मिक्सी मैन बाबू राजेंद्र नाथ, आल इंडिया फार्मा इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के चेयरमैन टीसी कंसल, प्रदीप खेड़ा, सत्यकांत अवस्थी, एसएमई फार्मा इंडस्ट्रीज कांफेडरेशन के सीनियर वाइस प्रेजीडेंट जीडी छिब्बर, वेद प्रकाश पसीचिया, पवन छिब्बर, उद्यमी सुभाष आर्य, चरणजीत सिंह, बाल किशन ठाकुर, ओम प्रकाश सहगल, कैलाश नाथ धीर, श्रीमती प्रवेश हांडा, सतीश कुमार, महेश गुप्ता, सुभाष मित्तल, पूर्व चीफ इंजीनियर एके गुप्ता, एचएसआईडीसी एसोसिएशन के उपप्रधान सुभाष धीमान, प्रवीन मित्तल, जसपाल सिंह, ओमप्रकाश सहगल, सुदेश कुमार, मदन लाल अग्रवाल, राजीव अग्रवाल समेत उद्यमी उपस्थित रहे।
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जब माइक्रो व स्माल इंडस्ट्री को एक बार स्टेट द्वारा रजिस्टर्ड कर दिया जाता है, तो केंद्र द्वारा उसे क्यों नहीं माना जाता। संबंधित इंडस्ट्री को केंद्र से अलग रजिस्ट्रेशन करवाने का कोई मतलब नहीं बनता, लेकिन उद्यमी इस समस्या को झेल रहा है। कागजी कार्रवाइयों में इस तरह से इंडस्ट्री को उलझाया जाता है कि अन्य काम प्रभावित होते हैं।
-ज्ञानचंद अग्रवाल, साइंसटिफिक अप्रैटस एंड मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन के प्रधान
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अंबाला से साइंस उपकरण पूरे विश्व में निर्यात किए जाते हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक अंबाला को साइंस सिटी के तौर पर पहचान नहीं मिली। कपूरथला जैसा शहर, जहां साइंस उपकरण भी नहीं बनते, उसे साइंस सिटी का दर्जा मिला है, तो अंबाला को क्यों नहीं?
-राकेश गुप्ता, दि साइंसटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स एंड मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन के प्रधान
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देखा जाए तो आजादी के बाद उन सेक्टरों में बूम आया, जिनमें सरकारी दखलंदाजी कम थी या नहीं थी। उद्योगों से जुड़े कुछ विभाग सरकार के मुखिया अपने पास रखते हैं, जिससे काम को बोझ बढ़ता है और परेशानियां पैदा होती हैं। यदि सरकार उद्योगों के लिए नियमों की प्रक्रिया को सरल करती है, तो देश में उद्योगों के पनपने की संभावनाएं काफी हैं।
-अश्वनी गोयल, पूर्व प्रेजीडेंट, असीमा-
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मौजूदा सरकार में कुछ बदलाव तो आया है, लेकिन अभी भी बहुत सुधार की जरूरत है। कैमिस्टों के लिए लाइसेंस फीस, तीन हजार, से बढ़ाकर तीस हजार रुपये कर दी है, जो पूरी तरह अनुचित है। इसे अतिरिक्त कई पेचिदगियां है, जिसमें बिना वजह दवा कारोबारी को फंसाया जा रहा है। दवाओं की ऑनलाइन सप्लाई, बिल्कुल ठीक नहीं है। सी फार्म की शर्त भी खत्म होनी चाहिए।
-प्रदीप खेड़ा, दवा उद्यमी-
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गेहूं वितरण का काम एफसीआई के पास चला गया है, आटा मिलें खाली हैं, सरकार गरीबों को राशन कम कीमत पर देना चाहती है, तो इसके लिए पात्रों को कैश दे। इंडस्ट्री पर तरह के सरचार्ज लगाकर महंगी बिजली दी जा रही है, जिसे दूर किया जाए। आज इंडस्ट्री को 11 से 13 रुपये प्रति यूनिट बिजली मिल रही है, जो महंगी है।
-सुभाष मित्तल, फ्लोर मिल मालिक-
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बैंक छोटे उद्यमियों को कर्ज देने में आनाकानी करते हैं और सिक्योरिटी मांगते हैं। सरकार के निर्देशों के बावजूद बैंकों द्वारा उद्यमियों को कागजी प्रक्रियाओं में उलझाया जाता है। लिमिट बढ़वाने के लिए जाते हैं, तो तरह-तरह से परेशान किया जाता है
-सत्यकांत, साइंस उद्यमी-
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बिजली विभाग द्वारा तरह-तरह के सरचार्ज लगाकर बिल मूल राशि से दुगने से अधिक कर दिया जाता है, सेल्स टैक्स का रिफंड लेने में पसीने छूट जाते हैं। जब एक बार सेल्स टैक्स रिफंड के लिए ओके कर दिया गया, तो दोबारा अप्लाई क्यों मांगा जाता है, रिफंड में भी अधिकारी व कर्मचारी उद्यमियों को कागजी कार्रवाईयों में उलझाते हैं
-कैलाश नाथ धीर, साइंस उद्यमी-
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बैंक अधिकारी छोटे लोन देने में आनाकानी करते हैं, जबकि करोड़ों के लोन फर्जी कागजातों पर आसानी से दे देते हैं। छोटे लोन की प्रक्रिया में अधिकारी उलझना ही नहीं चाहते। सरकार विदेशी कारोबारियों को देश में बुला रही है, लेकिन देश में इंडस्ट्री लगाने के लिए नियमों को तो सरलीकरण किया जाए। देश में स्थापित इकाइयों को सुविधाएं दी जाएं, तो बाहर से उद्यमियों को बुलाने की जरूरत ही नहीं है
-जीडी छिब्बर, एसएमई फार्मा इंडस्ट्रीज कांफेडरेशन के सीनियर वाइस प्रेजीडेंट-
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जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड सरकारों ने फार्मा उद्योगों के लिए फ्री जोन तो बना दिया, लेकिन हरियाणा के फार्मा उद्योगों का इससे काफी नुकसान हुआ है। हरियाणा में करीब 370 इकाइयां होती थी, लेकिन फ्री जोन के चक्कर में आधी से ज्यादा इकाइयां दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो गईं है।
-टीसी कंसल, चेयरमैन आल इंडिया फार्मा इंडस्ट्रीज एसोसिएशन-
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बिजली विभाग इंडस्ट्री पर हावी है। बिजली को लेकर जो उद्योगों को चाहिए, वह बिजली विभाग नहीं दे पाता है। कैंट इंडस्ट्रियल एरिया में तमाम समस्याएं हैं, लेकिन इनको बीते दशकों में दूर नहीं किया गया। मेक इन इंडिया से पहले अपने यहां की अफसरशाही पर लगाम लगाई जाए और नियमों का सरलीकरण किया जाए।
-सुभाष धीमान उपप्रधान एचएसआईडीसी एसोसिएशन-
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छोटे उद्यमियों के लिए करों में राहत देने चाहिए। सी फार्म की शर्त खत्म होनी चाहिए। जबकि दूसरे स्टेट में माल सप्लाई करने पर सीएसटी का इनपुट जो कि सेल्ट टैक्स के अंगेस्ट पहले एडजस्ट हो जाता था, वो अब भी एडजस्ट होना चाहिए। सरकार छोटे उद्यमियों के लिए काम का साकारात्मक माहौल बनाए।
-चरणजीत सिंह, साइंस उद्यमी-
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अंबाला की साइंस इंडस्ट्री को आज सौ साल से ऊपर हो चुका है, लेकिन अभी तक इस इंडस्ट्री को साइंस सिटी का दर्जा नहीं मिला है। इस इंडस्ट्री को आज सरकारी की ओर से संजीवनी की जरूरत है। दुनिया अंबाला की साइंस इंडस्ट्री का लोहा मानती है, तो सरकार भी इस ओर ध्यान दें और यहां अंबाला साइंस उद्योगों के लिए लटके प्रोजेक्ट को सिरे चढ़ाए।
-बाल किशन ठाकुर, साइंस उद्यमी-
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टेंडरिंग प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए, जो टेंडर रिजेक्ट होते हैं, तो उसका कारण भी सार्वजनिक किया जाए जो भी योजना बनाई जाए, उसे उद्योगों के हित में ईमानदारी से लागू किया जाए
-एके गुप्ता, पूर्व चीफ इंजीनियर
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मिक्सढी इंडस्ट्री को लेकर सरकार अपने स्तर पर काफी कमजोर है और एक्ट व्यवहारिक नहीं हैं, सरकार को टैक्स की फिक्र है, इंडस्ट्री की नहीं। आज बड़े, मध्यम, मझौले और छोटी इकाइयों के लिए मिनमिम वेजिज एक समान हैं क्यों? माइक्रो इंडस्ट्री को पूरी तरह से अलग कर इसके लिए अलग से मंत्रालय बनाया जाए। उद्योगों की एक्साइज लिमिट भी बढ़ाई जाए, जबकि महंगाई कहीं ज्यादा हो चुकी है।
-राजेंद्र नाथ, मिक्सी मैन-
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बड़ी इंडस्ट्री अपने हिसाब से कानून बनवाती है, जिससे छोटी इकाइयां पिस जाती हैं। मंत्री आदि विदेश में जाकर वहां की तकनीक देखने की बजाए उस फील्ड में काम करने वालों को विदेश भेजे, ताकि देश में यह उद्यमी उस तकनीक पर काम करें। सरकार बिजली की दरों को भी कम करे।
-वेद प्रकाश पसीचिया, लैदर उद्यमी-
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टैक्स की औपचारिकताएं इतनी अधिक हैं कि इससे उद्योगों को नुकसान होता है। थर्ड पार्टी यदि किसी छोटी इकाई से काम करवाना चाहती है, तो कागजी फेर के कारण पीछे हट जाती है
-परवेश हांडा, महिला उद्यमी-