संवाद न्यूज एजेंसी
अंबाला सिटी। डाकिया डाक लाया डाक लाया, खुशी का पैगाम कहीं..... जी हां हम बात कर रहे हैं डाक विभाग की। जो गर्मी-सर्दी व बरसात में भी देश- विदेश में बैठे अपनों के पैगाम व पार्सल आप तक निश्चित समय पर पहुंचाने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। कोविड-19 के दौर में पोस्टमैन को कोरोना योद्धा की संज्ञा दी जाए तो गलत नहीं होगा। जो विकट परिस्थितियों में भी दिन भर साइकिल पर सवार होकर घर-घर डाक पहुंचा रहे हैं।
देश में लगे दोनों लॉक डाउन में पोस्टमैन को डाक पहुंचाने में खासी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में उन लोगों तक डाक पहुंचाना इनके लिए चुनौती बन जाता है, जिनके कारोबार लॉकडाउन के चलते बंद पड़े होते हैं। क्योंकि कारोबारियों के पास अधिकतर रजिस्टर्ड पोस्ट आई होती है। जिस पर पोस्ट रिसिव करने वाले के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
यहां मैं अकेला ही रहता हूं, मेरा घर रेवाड़ी में है, ड्यूटी अंबाला में है। घर से प्रतिदिन मां का फोन आता है कि बेटा तुम ठीक हो, खाना खाया कि नहीं। मां की जुबान पर बस एक ही सवाल होता है बेटा तुम कैसे हो। अपना ध्यान रखना। ऐसे में अपने आपका ध्यान रखते हुए दिनभर साइकिल पर चलकर लोगों की आई हुई डाक समय पर पहुंचाना ही हमारा धर्म है। कोरोना काल में डाक पहुंचाने में थोड़ी परेशानी सामने आती है। जैसे-तैसे कर डाक को उचित व्यक्ति के पास समय से पहुंचाने के बाद ही राहत की सांस ली जाती है। -प्रशांत शर्मा, पोस्टमैन।
सुबह घर से निकलते समय 13 वर्षीय बेटा कहता है कि पापा अपना ध्यान रखना। वहीं घर में बुजुर्ग मां है जिसके स्वास्थ्य का ध्यान भी रखना बहुत जरूरी है। सुबह आकर अपनी डाक छांट कर अलग करते हैं, उसके बाद साइकिल पर सवार होकर निकल पड़ते हैं। वैसे तो सब कुछ ठीक ही रहता है लेकिन कोरोना काल में रजिस्ट्रेड डाक पहुंचाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। क्योंकि ज्यादातर इस तरह की डाक दुकानदारों की होती हैं, जाते हैं तो उनकी दुकानें बंद मिलती हैं। फिर उनका फोन कर सूचित किया जाता है। डाक देने के बाद ही हम राहत भरी सांस लेते हैं। -कमलदीप सिंह, पोस्टमैन।
हिसार का रहना वाला सुमित अंबाला में कार्यरत है। सुमित बताते हैं कि कोरोना काल में थोड़ी परेशानी जरूर होती है। ऐसे समय में अधिकतर लोग डाक लेने के बाद साइन करना भी उचित नहीं समझते। जब उनको साइन करने के लिए कहा जाता है तो दूर से ही कह देते हैं कि आप खुद ही साइन कर लो। लेकिन कुछ लोग ऐसे मिलते हैं डाक मिलते ही सामने वाला व्यक्ति जब शुक्रिया बोलता है तो सारी परेशानी छू मंतर हो जाती है। - सुमित कुमार, पोस्टमैन।
करीब एक दर्जन कालोनियों में डाक पहुंचा रही शिमला देवी दूसरे साथियों के लिए भी प्रेरणा बनी हुई हैं। शिमला देवी बताती हैं कि कोरोना के समय में काम करना थोड़ा चुनौती पूर्ण है लेकिन उससे ज्यादा चुनौती पूर्ण घर में डेढ़ वर्षीय पोती काव्या को समझाना होता है जो काम से घर लौटते ही गोदी में आने की जिद करती है। बड़ी मुश्किल से उससे छुपते हुए खुद को सैनिटाइज करने के बाद उसे गोदी में लेती हूं, तब जाकर पल भर में ही दिनभर की थकान दूर हो जाती है। - शिमला देवी, पोस्टमैन।