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नारायण के पारायण होकर ही माया को हराया जा सकता है : संत रामानंद

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अंबाला। साहा के मिट्ठापुर स्थित श्री सतशरणम योग अभ्यास आश्रम में रविवार को प्रवचन देते हुए संत रामानंद महाराज ने भक्तों को सत्संगी महिमा बताई। उन्होंने कहा, नारायण के पारायण होकर ही माया से पार पाया जा सकता है। जीवन में सबसे दुर्लभ कार्य संतों का सत्संग प्राप्त करना होता है। पूर्व में किए अच्छे कर्मों के फलस्वरूप हमें मानव जीवन तो मिल जाता है पर इस जीवन में करना क्या है, यह संत ही बताते हैं। संत रामानंद ने कहा कि भगवान के भक्तों के लक्षण क्या है, माया क्या है।
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मैं-मेरा, तू-तेरा यही माया है। माया दो तरह की होती है। एक बहिरंगा माया और दूसरी भगवान की योगमाया। इस माया से पार जाना बढ़ा मुश्किल है। मनुष्य सुख के लिए प्रयास करता मगर उसे दुख मिलता है, ऐसा क्यों यह इंसान को सोचना चाहिए। ऐसे में व्यक्ति को गुरुओं की शरण लेनी चाहिए। उन्होंने कहा, गुरुओं को भगवान का स्वरूप समझ कर उनकी पूजा करनी चाहिए। संतों से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि हमें भगवान की भक्ति कैसे करनी है। कहा कि सरल बनो, शांत रहकर भजन करना सीखो, चरित्र की रक्षा करते हुए एक पति व पत्नीव्रता धर्म का पालन करो। अपने शास्त्र में अटूट श्रद्धा रखो पर दूसरे के शास्त्रों की निंदा कतई न करो।
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