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पापियों के वध के लिए कृष्ण ने लिया था अवतार : राजेश्वरानंद

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आशा सिंह गार्डन में श्रीमद्भागवत कथा सुनते हुए श्रद्धालु।
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अंबाला सिटी। आशा सिंह गार्डन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे चौथे दिन कथा वाचक आचार्य स्वामी राजेश्वरानंद महाराज ने श्री कृष्ण के जन्म की गाथा सुनाई। उन्होंने कहा कि द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था।
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उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशियों के मुखिया से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।
इसी दौरान रास्ते में आकाशवाणी हुई कि हे कंस जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।कंस ने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।
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वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए।
कंस के डर से वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कंस ने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई। कन्या ने देवी का रूप लेकर कंस को चेतावनी दी कि जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।
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