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शिव के तेज से कार्तिकेय का जन्म : पंडित राकेश

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अंबाला सिटी के जट्टां वाले प्राचीन ​शिव मंदिर में कथा सुनते हुए श्रद्धालु। संवाद
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अंबाला सिटी। अंबाला सिटी के जट्टां वाले प्राचीन शिव मंदिर में चल रही शिवमहापुराण कथा में मंगलवार को आठवें दिन कथा वाचन पंडित राकेश शर्मा ने भगवान कार्तिकेय के जन्म की गाथा सुनाई।
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जब माता पार्वती भगवान शिव का तेज सहन नहीं कर पाई तो भगवान शिव ने उसे अग्नि को सौंपने को कहा कि। लेकिन अग्नि भी उस तेज को सहन न कर सकी। इसके बाद नारद मुनि ने अग्नि से कहा कि मैं तुम्हें इसका एक सहज उपाय बतलाता हैं । माघ के महीने में जो स्त्री प्रयाग में स्नान करने आए उसकी देह में तुम इस महत को स्थापित कर देना । ब्रह्माजी कहते हैं, इसी समय वहां पर सप्तर्षि की भी पत्नी आ गईं।
उनमें से छह स्त्रियों शीत से अधिक आर्त्त होकर अग्नि की ज्वाला के समीप गई। फिर तो उसी क्षण उनके रोमों से शिवजी के तेज इनके शरीर में प्रवेश कर गये । अग्नि दाहरहित हो गया । छहों स्त्रियां अग्नि से गर्भवती हो दुखी हो गई। उनके पतियों ने उन्हें त्याग दिया। वे हिमालय पर जाकर तप करने लगीं। वहां उन्होंने उस गर्भ को त्याग कर शांति लाभ किया। परंतु तब वह पर्वतराज भी उस गर्भ को सहन न कर सका तो गंगाजी में गिरा दिया।
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गंगाजी भी सहन न कर सकीं तो उन्होंने अपनी तरंगों से उस तेज को सरकंडे के वन में त्याग दिया। वहां पर एक तेजस्वी बालक उत्पन्न हो गया। जिसका नाम कार्तिकेय रखा गया। मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी के दिन शिवजी के उस पुत्र का पृथ्वी पर प्रादुर्भाव हुआ । उसके आविर्भूत होते ही हिमालय पर स्थित शिव-पार्वती को भी बड़े आनंद की अनुभूति हुई।
तीनों लोकों में सुखदायक मंगल हो गया। दुष्टों को और विशेष कर दैत्यों को बड़े ही विघ्न दिखाई पड़े। आकाश में दंदुभियां बजने लगीं और सरकंडे के वन में कार्तिकेय पर फूलों की वर्षा हुई। विष्णु सभी देवता आनंदित हो गए।
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