शहीद पवन कुमार की मां ने सजाया कमरा
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मौत वही जिसे दुनिया याद करे, यूं तो आते हैं जहान में सभी मरने के लिए, यह पंक्तियां शहीद पवन कुमार पर फिट बैठती हैं। कारगिल के युद्ध में अपने शौर्य का परिचय देते हुए 12 जाट रेजीमेंट के वीर सिपाही पवन कुमार महज 27 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए। 31 अगस्त 1999 को समय करीब दोपहर के 12 बजे का था।
जब दुश्मनों के छक्के छुड़ा रहे थे तक सामने से एक बम आया और पवन कुमार की फौलादी छाती को चिरता हुआ निकल गया। शहीद पवन कुमार के बड़े भाई कृष्ण लाल ने बताया कि उस समय शाम को रेडियो पर खबरें आती थी। जिसमें प्रतिदिन की प्रतिक्रिया बताई जाती थी। पवन के बारे में हमें पटवारी संत राम ने अगले दिन एक सितंबर को सुबह 9 बजे यह सूचना दी। जिसके बाद परिवार की आंखें नम हो गई।
गांव को बेटे पर नाज
नारायणगढ़ के गांव गधौली में किसान ईश्वर राम व माता सरदारी देवी के घर दो फरवरी 1972 को जन्मे पवन कुमार परिवार में सबसे छोटा होने के नाते सबका लाडला था। शहीद पवन कुमार के भाई ने बताया कि बड़े भाई रामजी लाल ने पिता के साथ खेतों में मेहनत कर हम लोगों को पढ़ा लिखाकर इस काबिल बनाया।
शहीद पवन कुुमार यमुनानगर से डीजल मैकेनिक में आईटीआई करने के बाद सन् 1990 में आर्मी में भर्ती हो गए। परिजनों के अनुसार पवन का बचपन से ही देश सेवा करने का सपना था। जिसको पूरा करने के लिए पवन ने जी तोड़ मेहनत की व भारतीय फौज में शामिल होकर कामयाब हुए।
24 सितंबर 1999 को थी शादी
जून 1998 में छुट्टी पर आए पवन की सगाई नारायणगढ़ के ही गांव गढ़ी में हुई। जिसके बाद शादी की तारीख 24 सितंबर 1999 तय की गई। जब ऑप्रेशन विजय शुरू हुआ उस समय पवन की तैनाती सियाचिन में थी। वहां शहीद पवन की तीन महीने की तैनाती समाप्त होने में केवल दो दिन शेष थे।
इसके बाद छुट्टी मंजूर की गई थी। क्योंकि 24 सितंबर 1999 शहीद पवन की शादी की तारीख निर्धारित की गई थी। परंतु इससे पहले 31 अगस्त 1999 को पवन ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। पवन का पार्थिव शरीर तीन सितंबर 1999 को पैतृक गांव पहुंचा। जिसके बाद से बेटे की यादों को संजोए रखते हुए मां ने आज भी बेटे के कमरे को सजाकर रखा हुआ है।