अंबाला। श्री बांके बिहारी मंदिर गोविंद नगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस हरिद्वार से पधारे स्वामी प्रेमानंद महाराज ने विदुर जी के प्रेम पूर्ण चरित्र का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने राजा धृतराष्ट्र का छप्पन भोग छोड़ा और महात्मा विदुर के घर आकर केले के छिलके का भोग लगाया, क्योंकि परमात्मा प्रेम के भूखे हैं।
प्रेम में ‘मैं’ मिटता है और केवल ‘तू’ यानि परमात्मा रह जाता है। मैं को मिटाने का नाम भक्ति है। वाराह अवतार और कपिल अवतार की कथा सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा कि हमारे भीतर का लोभ हिरण्याक्ष है व संतोष वाराह है। सबसे बड़ा धन संतोष है। संतोष रूपी धन के द्वारा लोभ रूपी हिरण्याक्ष का वध करना चाहिए। मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
मन एक ही है अगर संसार के भागों में लगे तो बंधन का कारण हो जाता है और यदि यही एक मन परमात्मा की भक्ति में लग जाए तो मुक्ति प्रदान करने वाला होता है। सभा के प्रधान दिनेश बहल एवं महासचिव रमेश धीमान ने बताया कि यह कथा मंदिर के निर्माण में योगदान देने वाले पुराने एवं वयोवृद्ध सदस्यों के इतिहास को नमन करने के साथ-साथ भावी पीढ़ियों को जोड़ने का संकल्प है।
कथा में अविनाश शर्मा, अरूण गुप्ता, संदीप वासन, पुनीत वर्मा, ओम प्रकाश शर्मा, बृजमोहन, सतीश दुआ, दीपा, नीतू, पवन कोहली, चन्द्र मोहन, शीला, शबनम, पुंज एवं दिनेश चोपड़ा एवं सभा के सभी सदस्य उपस्थित रहे। आज प्रसाद की व्यवस्था मुसद्दीलाल परिवार, भाटिया जी, नागपाल एवं मल्होत्रा परिवारों द्वारा किया गया।