काला पीलिया यानि हेपेटाइटिस-सी को 2030 तक देशभर से उखाड़ फेंकने के लक्ष्य में जुटी केंद्र सरकार के रास्ते में रुकावट आ सकती है। क्योंकि प्रदेश में 8 अक्टूबर से अब तक हेपेटाइटिस-सी से जूझ रहे किसी भी मरीज का सरकारी स्तर पर वायरल लोड टेस्ट नहीं हो सका। लिहाजा नये मरीजों की पहचान करीब एक माह से बंद होने के साथ-साथ उनका इलाज भी शुरू नहीं हो पा रहा। क्योंकि निजी स्तर पर 90 प्रतिशत मरीज इस टेस्ट को करवाने में सक्षम नहीं होते। बिना टेस्ट करवाए दवाएं भी शुरू नहीं की जा सकती क्योंकि इन दवाओं की कीमत औसतन एक मरीज के लिए करीब 45 हजार रुपये पड़ती है। हालांकि हेपेटाइटिस-सी की सभी दवाएं सरकारी अस्पतालों में मौजूद हैं लेकिन बिना वायरल लोड टेस्ट के दवा नहीं दी जा सकती।
इसलिए नहीं हो पा रहा वायरल लोड टेस्ट
दरअसल यह टेस्ट बेहद महंगा है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस-सी नियंत्रण के तहत इसके उन्मूलन के प्रयास में जुटी है। इसी के तहत प्रदेश सरकार ने वायरल लोड टेस्ट करवाने के लिए लाल पैथ लैब से अनुबंध किया था लेकिन 8 अक्टूबर को यह अनुबंध खत्म हो गया था। इस दौरान आचार संहिता लगी थी। मरीज का टेस्ट करवाने के लिए उसे नागरिक अस्पताल से कूपन दिया जाता था। कूपन लेकर लाल पैथ लैब से मरीज का निशुल्क टेस्ट हो जाता था जोकि अब 8 अक्टूबर से बंद है।
अंबाला में 192 मरीज, 4 की मौत
अंबाला की बात करें तो यहां 192 मरीजों को अभी तक हेपेटाइटिस-सी की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से करीब 72 मरीज सेंट्रल जेल के हैं। करीब एक साल के अंदर एक 85 वर्षीय बुजुर्ग महिला, एक बच्चे और दो बंदियों की मौत जिले में हेपेटाइटिस-सी के चलते हो चुकी है। इन सभी मरीजों को हेपेटाइटिस-सी के अलावा किसी को एड्स तो किसी को थैलेसीमिया व अन्य बीमारियां भी थी।
जिले में सीरम प्रोटीन टेस्ट भी बंद
काला पीलिया से जूझ रहे मरीजों का इलाज शुरू करने से पहले सीरम प्रोटीन टेस्ट भी करवाया जाता है। यह टेस्ट सरकारी अस्पतालों की लैब में भी आसानी से हो जाता है लेकिन अंबाला जिला अस्पताल में यह भी नहीं किया जा रहा जबकि डायरेक्टर हेल्थ सेवाएं ने इस बारे में भी जिला नागरिक अस्पतालों को निर्देश तक जारी किए हैं।
यह है वायरल लोड टेस्ट और कीमत
हेपेटाइटिस-सी की जांच के लिए यह वायरल लोड टेस्ट करवाया जाता है। यह टेस्ट एड्स की जांच के लिए भी होता है। इसमें वायरल लोड की मात्रा देखी जाती है। यह टेस्ट इसीलिए किया जाता है ताकि इलाज के प्रभाव पर नजर रखी जा सके। एक मरीज को यह टेस्ट इलाज शुरू करवाने से पहले और 3 माह तक दवा खाने के बाद करवाना पड़ता है। एक बार टेस्ट करवाने की कीमत 4500 रुपये है।
ये है सीरम प्रोटीन टेस्ट
सीरम प्रोटीन टेस्ट किडनी पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच के लिए किया जाता है। इस टेस्ट से यह देखा जाता है कि व्यक्ति के लीवर और किडनी की कंडीशन कैसी है। इसी के आधार पर व्यक्ति का ट्रीटमेंट तय किया जाता है। हालांकि कई बार व्यक्ति की कंडीशन को देेखकर इस टेस्ट को अनदेखा भी कर दिया जाता है।
काले पीलिया के लक्षण
काला पीलिया एड्स से भी ज्यादा खतरनाक होता है। इसके लक्षण भी एड्स जैसे ही होते हैं। मरीज को भूख न लगना, लगातार वजन कम होना, बुखार व खांसी होना। दवा के बाद भी ठीक न होना।
कारण: इनफेक्टिड सिरिंज का प्रयोग, नाई से शेव के समय ब्लेड न बदलने के कारण एक-दूसरे के रक्त के संपर्क में आने से, असुरक्षित यौन संबंध।
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हेपेटाइटिस सी के टेस्ट और दवा
वायरल लोड, सीरिम प्रोटीन टेस्ट। इसके अलावा सोफोसवियर, टेबलेट डेकेलरा सवियर, टेबलेट सोफा प्लस वैलपैटा सवीर यह तीनों दवाएं हैपीटाइटस सी के मरीजों को दी जाती हैं। इन तीनों दवाओं की एक महीने की कीमत करीब 15 हजार रुपये है और औसतन करीब तीन महीने एक मरीज को निरंतर यह दवाएं चलानी पड़ती हैं। औसतन दवा लेने से पहले और दवा लेने के बाद दो बार मरीज को वायरल लोड टेस्ट करवाना पड़ता है।
सीरम प्रोटीन टेस्ट क्यों नहीं हो रहा यह जांच करवाई जाएगी। जहां तक वायरल लोड टेस्ट की बात है तो यह टेस्ट काफी महंगा होता है। इसके लिए पहले सरकार का लाल पैथ लैब के साथ अनुबंध हुआ था जोकि 8 अक्टूबर को खत्म हो गया। आचार संहिता के चलते बाद में रिन्यू नहीं हो सका था। उम्मीद है कि नवंबर माह के दूसरे सप्ताह तक यह अनुबंध रिन्यू हो जाएगा।
संजीव सिंगला, उप सिविल सर्जन।