सिल्वर स्क्रीन पर बेशक सुल्तान करोड़ों रुपये बटोर रही है, लेकिन जिले के अखाड़े सरकारी मदद के अभाव में ‘सुल्तान’ सरीखे रेसलर नहीं बना पा रहे हैं। अखाड़ों की परंपरा हाशिये पर जा रही है। सरकार के पास अखाड़ों के लिए कोई विशेष योजना नहीं है। इतना नहीं कि अखाड़े भी खेल विभाग के पास रजिस्ट्रेशन नहीं करवा रहे हैं, जबकि विभाग के पास करीब एक दर्जन अखाड़े ही रजिस्टर्ड हैं। यही कारण है कि अंबाला से इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के रेसलर नहीं पनप पा रहे हैं।
यह स्थिति है अंबाला में अखाड़ों की
जिला अंबाला में अखाड़ों की हालत ज्यादा अच्छी नहीं है। कुछ ही अखाड़ों में मैट हैं, जबकि अधिकतर तो मिट्टी के भरोसे ही चल रहे हैं। इन अखाड़ों में आने वाले खिलाड़ी संसाधनों के अभाव में अपना करियर नहीं बना पा रहे हैं। गांवों से भी अखाड़े गायब होते जा रहे हैं, जबकि जिला स्तर पर होने वाले मुकाबलों में ही अखाड़ों से पहलवान कुश्ती में उतरते हैं। रेसलर खुद बताते हैं कि यदि रेसलिंग में अपना करियर बनाना है तो उसके लिए आधुनिक फिटनेस उपकरण तो चाहिए, साथ ही अच्छी खुराक भी चाहिए। यही सब अखाड़ों में नहीं मिल पाता। दूसरी ओर स्कूल गेम्स में रेसलिंग की गेम शामिल है, लेकिन अंबाला में स्कूल स्तर पर प्रैक्टिस के लिए कुछ भी नहीं है।
रविवार को रहता था झंडे वाली कुश्ती का इंतजार
अंबाला में कभी अखाड़ों के पहलवानों व कुश्ती खेल के दर्शकों को रविवार का इंतजार रहता था। हर रविवार को अंबाला कैंट में कुश्ती प्रतियोगिताएं होती थीं, जिनमें अखाड़ों के पहलवान एक दूसरे पर दांव पेच आजमाते थे। रविवार को ही प्रतियोगिता में झंडे वाली कुश्ती का इंतजार रहता था, जो सबसे आखिर में होती थी। यह परंपरा कई सालों तक चली, लेकिन अब यह बंद हो चुकी है।
यह मदद मिले तो गुलजार हों अखाड़े
- अखाड़ों को मैट उपलब्ध करवाए जाएं ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेसलर पहुंच सकें
- अखाड़ों के लिए अलग से कोई योजना बनाई जाए, जिसमें सरकार की ओर से मदद मिले
- रजिस्टर्ड किए जाने वाले अखाड़ों को आधुनिक फिटनेस उपकरण मिले और खिलाड़ियों को डाइट दी जाए
- अखाड़ों का सर्टिफिकेशन भी हर साल किया जाए और इनकी परफॉरमेंस के आधार पर मदद दी जाए
- जिला स्तर पर स्पांसरशिप के तहत लीग करवाई जाएं, ताकि रेसलरों को आगे बढ़ने के ज्यादा अवसर मिलें
- अखाड़ों में आने वाले रेसलरों का फ्यूचर सिक्योर किया जाए, ताकि रेसलर इस खेल में अपना शत प्रतिशत दे और आगे बढ़े
यह कहते हैं कुश्ती प्रेमी
अंबाला के रघुनाथ गुप्ता, दर्शन लाल, कश्मीरी लाल, हरबंस सिंह, रोशन आर्य, लाभ सिंह, कमल कुमार, रणजीत सिंह का कहना है कि अखाड़े देश की पहचान हैं और इनकी ओर सरकार कोई खास ध्यान नहीं दे रही है। अखाड़ों की हालत किसी से छिपी नहीं है, जबकि आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेसलिंग का स्टेंडर्ड काफी बदल चुका है। ऐसे में अखाड़ों का स्वरूप भी बदलना होगा, तभी हर जिले से ‘सुल्तान’ निकलेंगे।
खेलों के लिए सरकार काफी खर्च कर रही है। जिला में कुश्ती के खेल के लिए खेल विभाग के पास प्रशिक्षक हैं, जबकि अखाड़ों में भी खेल विभाग नजर रखता है। खिलाडिय़ों के लिए खेल विभाग प्रतियोगिताएं आयोजित करता है, ताकि इनको खेलों में आगे बढने के लिए मौका मिले। सरकार कुश्ती खेल के लिए योजना बना रही है।
- अरुण कांत, डीएसओ अंबाला