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ये फादर्स सिर्फ अपनी बेटियों के लिए जीते हैं

Sun, 19 Jun 2016 12:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ अंबाला
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अंबाला सिटी। उन्होंने इस बात की कभी फिक्र नहीं की, कि उनके पास औलाद के रुपये कभी बेटा नहीं है। सामाजिक व पारिवारिक ताने भी सहे, लेकिन सबकुछ नजरअंदाज किया। क्योंकि इन फादर्स को कभी ‘बेटा ही हो’ ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। ईश्वर ने औलाद के रूप में इन्हे जो दिया, उसे वे ईश्वर द्वारा प्राप्त वरदान से कम नहीं समझतें। ये फादर्स अपनी बेटियों को ही अपनी जमीन और आसमान समझते हैं और अपनी बेटियों को कामयाबी के फलक पर सितारा बनकर चमकता देखना चाहते हैं। ये फादर्स सिर्फ अपनी बेटियों के लिए ही जीते हैं और उनकी कामयाबी के लिए ही संघर्षरत है। फादर्स डे पर इन फादर्स ने अमर उजाला से अपनी भावनाएं सांझी की। 
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दोनों बेटियों को बनाया इंजीनियर
राजकीय स्कूल प्रेमनगर के प्राचार्य अनिल शर्मा बताते हैं कि उनकी दो बेटियां है। बड़ी बेटी प्रियंका और छोटी बेटी अंकिता। प्रियंका जहां कंप्यूटर इंजीनियर है और खुद अपनी छोटी से कंपनी बनाकर सिस्टम डेवलपमेंट का काम करती है, वहीं छोटी बेटी अंकिता आईटी इंजीनियर है और एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करती है। लेकिन अब वे अमेरिका से एमएससी कंप्यूटर साइंस करके गूगल में जॉब करना चाहती है। प्राचार्य अनिल शर्मा बताते हैं कि उन्होंने कभी इच्छा नहीं हुई कि उनके पास सिर्फ बेटा ही हो। उन्होंने बताया कि उनकी दोनों बेटियों ही उनका कल आज और  कल है। वे हमेशा अपनी बेटियों को कामयाब बनाने के लिए संघर्षरत और ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहते हैं।

उनका कहना है कि बदनसीब है वो मां-बाप जो सिर्फ बेटों की चाह रखते हैं, क्योंकि घर की बरकत बेटियों से ज्यादा होती है। उनकी पत्नी नीरू  शर्मा कहती है कि सामाजिक व पारिवारिक तानों की उन लोगों ने कभी परवाह नहीं की। 
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 बेटी कामयाब हो, तभी सफल होगा जीवन
 नग्गल राजकीय स्कूल के मैथ लेक्चरर नरेंद्र  सिंह के अनुसार उनके पास कुशलदीप नाम की बेटी है, जो अभी चौथी कक्षा में पढ़ती है। लेक्चरर नरेंद्र सिंह ने कहा कि उन्होंने अपनी बेटी को कभी बेटे से कम समझा ही नहीं, इसलिए शायद कभी बेटे की कमी कभी नहीं खलती। उनके अनुसार उन्होंने फैसला कर लिया है कि वे अपनी बेटी को कामयाब बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगी। उनकी बेटी जितनी पडना चाहती है, जो बनना चाहती है,
वे अपनी बेटी के मिशन में एक मजबूत इमारत की तरह उसके साथ खड़े रहेंगे। नरेंद्रं सिंह का कहना है कि उन्हें पूरा भरोसा है कि एक दिन उनकी बेटी उनका नाम जरूर रोशन करेगी और उन लोगों को भी उनकी बेटी पर फख्र होगा, जो सिर्फ बेटों की चाह रखते हैं।
 जब बेटियां ही बेटों जैसी, तो फिर क्या चाहिए...
 पहलवान और जिम संचालक राम भाई कहते हैं कि उनके पास सिर्फ दो बेटियां है। बड़ी नौ साल की हंशिका और छोटी चार साल की वरूणी। दोनों ही अभी छात्रा है, लेकिन उन्हे अपनी बेटियों में ही अपने बेटे दिखते हैं, इसलिए अब उन्हे और कुछ नहीं चाहिए। बस, अब वे एक जिम्मेवार पिता बनकर अपनी बेटियों को फलक पर सितारे की तरह चमकता देखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने संघर्ष भी शुरू कर दिया है।
वे अपनी बेटियों को म्यूतिक, डांस, पेटिंग इत्यादि एक्टिविटी सिखाते रहते हैं। उनके अनुसार अब जमाना बदल रहा है, अभिभावकों को सिर्फ बेटों का मोह छोड़ देना चाहिए। उनके अनुसार उन्हे उस वक्त बहुत पीड़ा होती है, जब किसी महिला को आशीर्वाद में अमूमन पुत्रवती होने का ही आशीर्वाद मिलता है। कोई पुत्रीवती का आशीर्वाद क्यों नहीं देता? उनके अनुसार अब बेटियों के लिए जागरूक होने की जरूरत है। इसलिए हमें जागना होगा।
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