अंबाला सिटी। भगवान जब भी धरती पर अपनी लीलाएं करने पहुंचे तो आमजन के बीच रहकर अपनी लीलाओं का प्रमाण दिया। मगर भगवान ने अपनी लीलाओं को ज्ञान किसी को आसानी से नहीं होने दिया। चाहे परिस्थितियां कैसी भी रही हों।
भगवान स्वयं आमजन की तरह अपने कार्य करते हुए दुख संकटों से भी गुजरते रहे। यह शब्द अंबाला सिटी के सेक्टर-7 स्थित श्री नीलकंठ महादेव मंदिर में चल रही श्रीराम चरित्र मानस श्री रामायण पाठ की कथा के दौरान कथा व्यास पंडित भगवती प्रसाद पुरोहित ने उपस्थित भक्तों से कहे। कथा से पूर्व प्रतिदिन की तरह समाजसेवी सदस्य अशोक जिंदल परिवार ने श्री रामायण पुराण का विधिवत पूजन किया।
जहां पं. धर्मेंद्र गौड और पं. त्रिलोचन शर्मा ने मंत्रोच्चारण कर पूजन कार्य संपन्न करवाए। तत्पश्चात कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कथा व्यास पं. पुरोहित ने कहा कि जब अयोध्या में चारों ओर उत्सव मनाया जा रहा था, तो इसी बीच राजा दशरथ व अन्य ऋषि मुनियों ने भगवान श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने पर सहमति जताई। यह खबर देवी-देवताओं को लगी तो सभी देवों की चिंता बढ़ने लगी।
उन्होंने विचार किया कि भगवान श्रीराम का जन्म रावण जैसे राक्षसों का वध करने के उद्देश्य से हुआ था। तब सभी देवी-देवता मां सरस्वती के पास गए और अपनी चिंताओं के विषय में अवगत करवाते हुए मां सरस्वती से अनुरोध किया कि आप कुछ ऐसा करें कि भगवान श्रीराम को वनवास हो जाए, तब देवी सरस्वती ने कैकेयी की दासी मंथरा की बुद्धिमति फेर देती हैं और मंथरा ने कैकेयी को कहा कि अगर श्रीराम अयोध्या के राजा बन गए, तो कौशल्या का प्रभाव बढ़ जाएगा। इसलिए भरत को राजा बनवाने के लिए तुम्हें हठ करना चाहिए। यह सब मंथरा की जुबान से देवी मां सरस्वती बोल रही थी। मंथरा की बातों में आकर कैकेयी ने खुद को कोप भवन में बंद कर लिया। राजा दशरथ जब कैकेयी को मनाने पहुंचे, तो कैकेयी ने अपने पूर्व के दो वचनों की मांग को उठाते हुए युवराज भरत को राजा और श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांग लिया।