पूर्व सैनिकों ने आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए यूथ ब्रिगेड तैयार करने का फैसला लिया है। वन रैंक, वन पेंशन के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अंबाला की महासंग्राम रैली के बाद दिल्ली से आए पूर्व सैनिकों ने आगामी रणनीति पर चर्चा की। ये यूथ बिग्रेड कोई और नहीं, बल्कि पूर्व सैनिकों के परिवार के ही बच्चे होंगे। जो अपने बुजुर्गों के इस आंदोलन को अलग-अलग तरीकों से आगे लेकर जाएंगे।
रणनीति पर चर्चा करने के बाद अमर उजाला से बातचीत करते हुए यूनाइटेड फ्रंट एक्स सर्विसमैन के चेयरमैन मेजर जनरल सतबीर सिंह ने बताया कि सरकार के जो मौजूदा हालात चल रहे हैं, उससे लगता नहीं कि सरकार जल्द ही पूर्व सैनिकों के आगे झुकेगी।
इसलिए फ्रंट ने ये फैसला लिया है कि अब देशभर में युवाओं की टोली बनाई जाए। जो पूर्व सैनिकों के इस आंदोलन के कमान को थामकर उनकी युवा शक्ति के रूप में काम करे। उनके अनुसार यही यूथ सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से पूर्व सैनिकों का दर्द देशवासियों तक और सरकार तक पहुंचाने का काम अपने अंदाज से करेगा। इस पर जल्द काम शुरू होगा।
चुनावों में दखल देगी एसोसिएशन
मेजर जनरल ने बताया कि इसके अलावा ये भी तय किया गया है कि बिहार के बाद अब जहां-जहां विधानसभा चुनाव होंगे, वहां पूर्व सैनिकों की ये एसोसिएशन दखल देगी। ये दखल वहां सरकार के खिलाफ चुनाव प्रचार अभियान छेड़कर या सरकार के नुमाइंदे के खिलाफ चुनाव में पूर्व सैनिक प्रत्याशी उतारकर किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि अभी आसाम, पंजाब और यूपी में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इसलिए अब इन राज्यों में पूर्व सैनिक अपनी सक्रियता को ज्यादा बढ़ाएंगे। उधर, यूथ की एक विशेष टीम गठित भी की जा चुकी है, जो दिल्ली जंतर-मंतर पर पूर्व सैनिकों के आंदोलन के प्राचार की कमान संभाले हुई है।
सोचा न था यूं मोदी तोड़ देंगे अपना वायदा
देश में वन रैंक, वन पेंशन के आंदोलन के फाउंडर मेंबर कर्नल इंद्रजीत सिंह भी सरकार के इस फैसले से बहुत ज्यादा आहत हैं। वे भी सेहत खराब होने के बावजूद स्ट्रैचर पर अंबाला में पूर्व सैनिकों की महासंग्राम रैली में भाग लेने पहुंचे। अमर उजाला से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा नहीं था कि भाजपा सरकार अपने वायदे से मुकर जाएगी। 14 ग्रेनेडियर रेजीमेंट से 1978 में रिटायर्ड 84 वर्षीय कर्नल इंद्रजीत कहते हैं कि उन्होंने 1982 में अपने कुछ साथियों के साथ ये आंदोलन शुरू किया था। उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।
उसके बाद उन्होंने एक बार 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सरकार और वर्ष 2006 में डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार में इस वन रैंक, वन पेंशन की मांग मनवा भी लिया था। सरकार पूर्व फौजियों की इस ओआरओपी की मांग को मानने को तैयार भी हो गई थी। लेकिन ब्यूरोक्रेटस ही हमेशा इस मांग को सिरे चढ़ने में आड़े आए। अब भाजपा सरकार में मोदी के वायदे के बाद पूर्व सैनिकों में आस बंधी थी। लेकिन इस बार भी ब्यूरोक्रेट्स ही सरकार को भ्रमित कर रहे हैं। इसलिए ये संघर्ष जारी रहेगा। 1965 व 1971 की लड़ाई लड़ चुके कर्नल इंद्रजीत सिंह कहते हैं कि अब यूथ उनके आंदोलन की ताकत बनेगा।