नारायणगढ़ (अंबाला)। नारायणगढ़ के छोटे से गांव मिर्जापुर माजरा निवासी नायब सिंह सैनी अब हरियाणा के 12वें मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। वे मंत्रिमंडल के साथ वीरवार को शपथ लेंगे।
कार्यक्रम से एक दिन पहले उनके परिजन नायब सैनी के पैतृक गांव में टीवी पर नजरें जमाए थे। जैसे ही टीवी व फोन के जरिए उन्हें जानकारी मिली कि नायब सैनी को एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है तो सभी झूम उठे। देखते ही देखते गांव के लोग उनके पैतृक निवास पर आ गए और एक-दूसरे का मुंह मीठा करते दिखाई दिए।
लोगों ने एक सुर में हरियाणा की जनता और भाजपा नेतृत्व का धन्यवाद दिया। इस दौरान सीएम के बड़े भाई चंदन सैनी को ग्रामीणों ने मिठाई खिलाई। वहीं चंदन सैनी ने कहा कि वह हरियाणा की जनता का धन्यवाद करते हैं जो उन्होंने भाजपा को प्रचंड जीत दिलाई। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भाई नायब सैनी ने तीन महीने के कार्यकाल में अपनी कार्यों से जनता का दिल जीता है। हालांकि कार्यकारी सीएम नायब सैनी के परिवार के अन्य लोग पंचकूला में पहले ही पहुंच गए थे।
दोपहर को उनकी माता कुलवंत कौर को भी पंचकूला परिजन ले गए। इस दौरान मां के चेहरे पर भी खुशी साफ देखी जा सकती थी। मिर्जापुर के रहने वाले विशाल ने बताया कि उन्हें खुशी है कि नायब सिंह सैनी को दोबारा से सीएम बनाया गया है। वह हरियाणा के बेहतर भविष्य के लिए पहले भी जुटे हुए थे और आगे भी जुटे रहेंगे।
गुरमेज सिंह ने बताया कि पूरे गांव में खुशी का माहौल है। गांव का एक बेटा इतने शीर्ष तक पहुंचा जिसे प्रदेशभर की जनता ने अपना प्यार दिया है। इस दाैरान विशाल, सुरेश पाल, बिंदर सिंह, मोहित सैनी, रोहित सैनी, गुरमेज सिंह, सचिन, हनीश, रसम आदि उपस्थित रहे।
एलएलबी तक ली की शिक्षा
25 जनवरी 1970 को जन्मे नायब सैनी ने 2010 में एलएलबी मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से की। पिता तेलुराम सैनी भारतीय सेना में नायक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद गांव में ही कृषि करने लगे थे। उनके परिवार में 70 वर्षीय मां कुलवंत कौर, पत्नी सुमन सैनी, बेटा अनिकेत और बेटी वंशिका हैं। वर्ष 2000 में नायब सिंह सैनी की शादी साधारण तरीके से नारायणगढ़ के सैन माजरा गांव में हुई। उन्हीं प्रेरणा से पत्नी सुमन भी चुनावी मैदान में उतरी थीं और अब भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष हैं। कार्यकारी सीएम नायब सैनी के भाई चंदन सिंह गांव में ही रहते हैं। वह बताते हैं कि वे मूलरूप से कुरुक्षेत्र के गांव मंगोली जाटान के हैं, मगर वर्ष 1960 में परिवार मिर्जापुर माजरा में बस गया था। पिता ने वर्ष 1962 में चीन के साथ तो वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भाग लिया था। वर्ष 2005 में वह पठानकोट से हवलदार के पद से सेवानिवृत्त होकर गांव पहुंचे। इसी वर्ष उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई।