अंबाला। यातायात के नियमों का पालन करवाना पुलिस की ही नहीं, प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। हम बाहरी देशों के उदाहरण तो बहुत देते हैं कि फोन करते ही पुलिस चुटकियों में पहुंच जाती है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी निभाने से हिचकिचाते हैं। यह जानकारी अंबाला कैंट के डीएसपी आशीष चौधरी ने अमर उजाला फाउंडेशन के तहत द एसडी विद्या स्कूल में आयोजित पुलिस की पाठशाला कार्यक्रम के दौरान दी।
यह कार्यक्रम पुलिस विभाग और द एसडी विद्या स्कूल प्रबंधन के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डीएसपी आशीष चौधरी ने बताया कि यातायात के नियम बनाए ही लोगों के जान-माल की सुरक्षा करने के लिए हैं। हम इसे जानबूझकर दरकिनार कर देते हैं और यह भी नहीं सोचते कि उनकी जरा सी लापरवाही या चूक किसी दूसरे पर भारी पड़ सकती है। वहीं स्कूल प्रबंधन ने स्थल को सजाया ताकि बच्चों को आसानी से ट्रैफिक लाइट्स, स्पीड ब्रेकर सहित यातायात से संबंधित जानकारी हासिल करने में कोई परेशानी न हो।
डीएसपी आशीष ने बताया कि जिस प्रकार हमारे शरीर में रक्त कोशिकाएं,धमनियां चल रही हैं, ठीक उसी प्रकार हमारा यातायात सिस्टम है जोकि गहनता के बाद विशेषज्ञों की निगरानी में तैयार किया गया है। इसमें सड़कों का स्वरूप इस प्रकार से तैयार किया जाता है कि दुर्घटनाएं न हों।
बंदर और चिड़िया का दिया उदाहरण
छात्रों की जिज्ञासा शांत करने के लिए डीएसपी ने कुछ उदाहरण दिए। उन्होंने बताया कि एक बार जंगल में आग लग गई। इस दौरान बंदर और चिड़िया नजदीक ही बैठे थे। चिड़िया अपनी चोंच में पानी भरकर ले जाती और आग पर गिरा देती, लेकिन बंदर जस का तस बैठा रहा। इस दौरान बंदर ने चिड़िया से कहा कि तुम्हारी चोंच के पानी से आग नहीं बुझेगी। इस पर चिड़िया ने जवाब दिया कि आग बुझे या न, लेकिन जब भी इस आग के संबंध में बात होगी तो मेरा जिक्र जरूर होगा।
छात्रों के प्रश्नों के डीएसपी आशीष चौधरी ने दिए जवाब
छात्रा यशस्वी ने पूछा कि किसान आंदोलन के दौरान उनकी कार जाम में फंस गई थी। डीएसपी ने बताया कि किसान आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जोकि पूरे देश से जुड़ा हुआ था। इसे लेकर पुलिस चप्पे-चप्पे पर तैनात रही। ऐसा नहीं है कि किसानों ने एंबुलेंस आदि को रास्ता नहीं दिया। हो सकता है कि कुछ वाहनों का उन्होंने रास्ता रोका है।
छात्र संयम ने पूछा कि ट्रैफिक कई बार पुलिस ज्यादती करती है। बाइक से चाबी निकालना फैशन बन गया है। पुलिस कर्मी दुर्व्यवहार भी करते हैं। डीएसपी ने बताया कि पूरे तालाब को एक मछली गंदा कर देती है। पुलिस कर्मचारियों को मृदु व्यवहार का पाठ पढ़ाया जाता है। अगर ऐसा कोई करता है तो उसके खिलाफ शिकायत की जा सकती है।
छात्रा दिवांशी ने पूछा कि कार का नंबर पैन से लिखा था, चालान हो गया। आशीष ने बताया कि ऐसा नहीं होना चाहिए। नई कार का नंबर पहले ही एजेंसी संचालक द्वारा दिया जाता है। आजकल इलेक्ट्रानिक प्लेट्स आ गई हैं। बिना नंबर प्लेट्स के कोई भी गाड़ी शोरूम से बाहर नहीं जाती। अगर फिर भी ऐसा कुछ हुआ है तो पुलिस कर्मी को सोचना चाहिए था।
छात्र सुवंश त्रेहन ने पूछा कि ट्रैफिक लाइट पर लालबत्ती के बावजूद वाहन चालक निकल जाते हैं। डीएसपी ने बताया कि ट्रैफिक लाइट पर कर्मचारियों की तैनाती की जाती है। कई बार दूसरी जगह ड्यूटी लग जाती है तो कर्मी चला जाता है। इसलिए वाहन चालक नियम तोड़ने लगते हैं। पुलिस की मौजूदगी में कोई नियम नहीं तोड़ता।
छात्र अभिजीत ने पूछा कि ट्रैफिक लाइट्स पर सीसीटीवी कैमरे क्यों नहीं लगाए जाते। उन्होंने बताया कि पूरे छावनी क्षेत्र में लगभग डेढ़ करोड़ की लागत से सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। यह कैमरे प्रत्येक चौक, संवेदनशील स्थानों और प्रमुख सड़कों पर लगेंगे। इनकी मदद से यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों को पकड़ा जाएगा।
छात्र आर्यवीर ने पूछा कि दुर्घटना के समय राहत नहीं मिलती और लोग वीडियो बनाते रहते हैं। डीएसपी ने बताया कि दुर्घटना के समय वीडियो बनाना चलन बन गया है। इसके लिए सभी को जागरूक होना पड़ेगा। इस परेशानी को देखते हुए सरकार ने तीन साल पहले डायल 112 की सुविधा शुरू की थी जोकि काफी कारगर साबित हो रही है।
छात्र ओजस भाटिया ने पूछा कि ओवर स्पीड का चलन बन गया है। युवक बुलेट पर पटाखे बजाते हैं। उन्होंने बताया कि ओवर स्पीड दुर्घटना का कारण बनती है। इसमें युवाओं की ज्यादा भागीदारी नजर आती है। बुलेट पर पटाखे बजाने वालों पर पुलिस लगातार शिकंजा कस रही है। कोई बुलेट चालक देखते हैं तो नंबर साझा करें।
अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से आयोजित पुलिस की पाठशाला कार्यक्रम बेहद सराहनीय रहा। कैंट डीएसपी आशीष चौधरी ने बढि़या उदाहरणों के माध्यम से छात्रों की जिज्ञासा को शांत किया। अब छात्रों को इस जागरूकता अभियान की अहम कड़ी बनना होगा ताकि वो परिजनों, सगे-संबंधियों व दोस्तों को यातायात नियमों के पालन की जानकारी दे सकें।
-शालू भसीन, वरिष्ठ विंग निदेशक, एसडी विद्या स्कूल।