अंबाला कैंट में कई सालों से जिला स्वास्थ्य विभाग की अनुमति के बिना संस्था द्वारा आंखों का ऑपरेशन किए जाने का खेल चल रहा था। ये संस्था आंखों के शिविर लगाने के नाम पर मरीजों को अपने से जोड़ती थी और फिर उनकी आंखों का ऑपरेशन करती थी, लेकिन खास बात यह है कि यह संस्था जिला स्वास्थ्य विभाग से किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली जाती थी। उधर, जिला स्वास्थ्य महकमा भी अब इस बात की जांच करेगा कि किस तरह से मरीजों की आंखों के ऑपरेशन किए गए और किस ऑपरेशन थिएटर में किए गए। साथ ही यदि आंखों का शिविर लगाया गया तो किसकी अनुमति से लगाया गया।
निरीक्षण से किनारा कर गई थी संस्था
वैसे तो ये संस्था कई सालों से कैंट के महेशनगर इलाके में सक्रिय है, लेकिन मई 2013 में इस संस्था ने जिला स्वास्थ्य महकमे के पास एक आंखों का कैंप लगाने के लिए मंजूरी दिए जाने का आवेदन किया था। चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर विनोद गुप्ता ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि ढाई साल पहले भी इस संस्था को आई कैंप की मंजूरी दिए जाने से पहले उनके ऑपरेशन थिएटर की निरीक्षण करवाने समेत कैंप के लिए जरूरी औपचारिकताएं पूरी किए जाने के लिए कहा गया था। डॉ. गुप्ता के अनुसार, उसके बाद ये संस्था दोबारा स्वास्थ्य महकमे के पास नहीं आई और न ही आजतक कभी इस संस्था ने आई कैंप लगावाने के लिए कोई अनुमति ली। यदि संस्था ने फिर से आई कैंप लगाया है तो वे अवैध है और इसी अवैध कैंप में इन मरीजों की आंखों की रोशनी जाने की सूचना उन्हें मिली है। जिसकी जांच करवाई जाएगी।
लापरवाही से जाती है आंखों की रोशनी
विशेषज्ञ डॉ. विनोद गुप्ता ने बताया कि आई कैंप के बाद आंखों की रोशनी जाने के मामले पहले भी पंजाब के गुरदासपुर व हरियाणा के पानीपत समेत कई इलाकों में सामने आ चुके हैं। उनके अनुसार ऐसे मामलों में लापरवाही ही सबसे बड़ी वजह होती है। सीएमओ ने बताया कि चूंकि आंख का ऑपरेशन बहुत ही संवेदनशील होता है, इसलिए आपरेशन थिएटर को विशेष प्रकार से तैयार किया जाता है। थिएटर में स्टरलाइजेशन का होना बेहद अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही उपकरणों की शुद्धता और स्टैंडर्ड की दवाइयों का इस्तेमाल होना बेहद जरूरी है। ऑपरेशन के दौरान यदि आंखों की रोशनी जाती है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह थिएटर में स्टरलाइजेशन में लापरवाही, इंफेक्शन ग्रस्त औजारों का इस्तेमाल करना और सब-स्टैंडर्ड की दवाओं का इस्तेमाल करना रहती है। दूसरा, आंखों में किसी और तरीके का भी इंफेक्शन हो तो मोतियाबिंद के ऑपरेशन से पहले उस इंफेक्शन को ठीक करना जरूरी होता है, उसके बाद ही लेंस डाले जाते हैं।
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मरीजों के परिजनों ने बयां किया दर्द
संतोषवती के दामाद इंद्रजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी सास को दिल्ली से यहां ऑपरेशन करने के लिए बुलवाया था, लेकिन ऑपरेशन के बाद ही उन्हें दिखना बंद हो गया। अब वे पीजीआई में 27 नवंबर से बैठे हैं। वहां भी 29 नवंबर तक उनके दो अॅापरेशन हो चुके हैं लेकिन फिर भी रोशनी नहीं आई।
मरीज देवेंद्र कौर के भाई जगमोहन सिंह ने बताया कि देवेंद्र कौर का भी पीजीआई में एक और ऑपरेशन हो चुका है, लेकिन फिर भी अभी तक आंख से नजर नहीं आ रहा है। मरीज शांति देवी के परिजन विनय ने बताया कि पीजीआई में भी शांति देवी की आंख का एक और ऑपरेशन हो चुका है, लेकिन उसके बावजूद भी कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है।
मरीज शारदा देवी ने भी बताया कि उनकी आंख का भी पीजीआई में ऑपरेशन हो चुका है, लेकिन अभी कुछ नजर नहीं आ रहा है, उनकी आंख में मवाद बताया गया है।
मरीज अयोध्या देवी के बेटे मदन मोहन ने बताया कि उनकी माता के भी एक आपरेशन पीजीआई में भी हो चुका है, लेकिन अभी तक उन्हें भी कुछ नजर नहीं आ रहा है। मरीज मनोहर सिंह के बेटे जसपाल सिंह ने बताया कि उनकी पिता की आंखों में काफी इंफेक्शन है, उनका भी एक आपरेशन पीजीआई में हो चुका है, लेकिन उन्हें रोशनी लौटने की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही है। मरीज शांतिदेवी की बेटी ममता ने बताया कि 29 नवंबर की रात तक उनकी माता के पीजीआई में भी दो ऑपरेशन हो चुके हैं, जिसमें उन्हें बताया गया है कि उनकी आंख के परदे के पीछे तो खून जमा है, पहले उसे ठीक किया जाएगा। पीजीआई में भी सभी मरीजों को बताया गया कि उनकी आंखों में इंफेक्शन फैल चुका है, जिस वजह से उनकी आंखों से दिखाई नहीं दे रहा है।