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Ambala News: अंग्रेजों के पुरखों की धरोहर को विवाद तले दबाने की साजिश

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वैभव शर्मा
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अंबाला। हरियाणा के सबसे पुराने शहरों में से एक अंबाला जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने अपनी छावनी बनाया था। यहां पर रहकर विश्व युद्ध के लिए अपने सैनिकों को तैयार किया और उसमें प्रतिभाग भी किया। युद्ध लड़ते हुए जो ब्रिटिश सेना के जवान अफसर शहीद हुए उन्हें अंबाला की धरती पर ही दफनाया। अंग्रेजों के जाने बाद उनके कब्रिस्तान और इतिहास को बचाने की जिम्मेदारी भारत पर आ गई। ऐसा ही एक ईसाई कब्रिस्तान अंबाला छावनी के अंबाला जगाधरी राजमार्ग पर स्थित है।



20 एकड़ में फैले इस कब्रिस्तान को संरक्षित स्मारकों में जगह दी गई है। इसके बावजूद यहां कब्रों को खोजना एक पहेली से कम नहीं है। सरकारी एजेंसियों के अधिकारी आते हैं मगर वह कागजी कार्यवाही तक ही सीमित रहते हैं। यहां लंबी-लंबी घास है जिसके कारण कई कब्रें तो दिखाई भी नहीं देती हैं। हैरानी तो इस बात से होती है कि इस कब्रगाह की देखरेख करने वाली दि अंबाला सीमेट्री समिति के पदाधिकारी इस जमीन पर कुछ लाेगों की निगाहें होने का आरोप लगा रहे हैं। उनका दावा है कि पहले वह हाईकोर्ट से केस जीत चुके हैं इसके बावजूद दोबारा से अंबाला के सिविल जज जूनियर डिविजन की अदालत में इसके संबंध में केस डाला गया है। जिसमें सुनवाई 26 मई को होनी है।
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केस में ब्रिटिश सरकार सहित 9 लोगों को किया है शामिल

दि अंबाला सीमेट्री समिति के महासचिव व कोषाध्यक्ष पातरस मुंडू बताते हैं कि हाईकोर्ट में जीतने बावजूद जो अब दोबारा से अकारण सिविल जज सीनियर डिविजन के यहां केस दायर किया गया है। इस बार अमृतसर डायसेन ट्रस्ट एसोसिएशन के माध्यम से कथित रूप से अंबाला के ही एक सहायक बिशप ने केस दायर किया है। जिसमें ब्रिटिश उप उच्चायोग चंडीगढ़, एसीएस हरियाणा संजीव कौशल, डीसी अंबाला, एसडीएम अंबाला और विभिन्न चर्चों के पदाधिकारियों को पार्टी बनाया गया है। इस मामले की सुनवाई 26 मई को होगी।

वर्ष 2021 में हाईकोर्ट ने हक में सुनाया था फैसला

दरअसल मौजूदा समय में ब्रिटिश कालीन ईसाई कब्रिस्तान की देखरेख की जिम्मेदारी अंबाला की छह कैथलिक चर्च को शामिल करते हुए बनी दि अंबाला सीमेट्री समिति के पास है। इस समिति के महासचिव व कोषाध्यक्ष पातरस मुंडू बताते हैं कि वर्ष 2019 में हाईकोर्ट में कब्रिस्तान की जमीन पर दावा करते हुए जनहित याचिका लगाई गई थी। दो वर्ष तक लड़ने के बाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2021 में समिति के पक्ष में फैसला सुनाया। इसमें यह माना गया कि जमीन का मालिकाना हक भारत सरकार के पास होगा तो ऑकूपेसी व देखरेख ब्रिटिश उच्चायोग के पास, चूंकि ब्रिटिश सरकार सीधे देखरेख नहीं कर सकती है ऐसे में उन्होंने अंबाला की छह चर्चाें को शामिल करते हुए एक कमेटी बनाई। जिसको देखरेख की जिम्मेदारी दी गई। अब ब्रिटिश सरकार, स्थानीय जनप्रतिनिधि और ईसाई समाज की मदद से इस कब्रिस्तान की देखरेख की जा रही है।
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विश्व युद्ध प्रथम के भी अग्रेज सैन्य अधिकारियों की कब्रें
कब्रिस्तान का अधिभोग अधिकार और प्रबंधन ब्रिटिश उच्चायोग के पास है। यहां प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों की 66 कब्रें हैं। युद्ध सैनिकों की कब्रें राष्ट्रमंडल युद्ध कब्र आयोग के संरक्षण में आती हैं। खास बात है कि इसे एक सैन्य कब्रिस्तान के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि ब्रिटिश काल में भारतीय सेना में सेवा करने वाले सैनिकों की याद में कई कब्रें और स्मारक बनाए गए हैं। यहां मिली कब्रें यूरोपीय वास्तुकला में हैं। पातरस मुंडू बताते हैं कि यहां 10 हजार के करीब कब्रें हैं। उनके परिजन इंग्लैंड से इन्हें देखने आते रहते हैं और मदद भी करते रहते हैं। इसके साथ ही यहां ब्रिटिश द्वारा बंदी बनाए गए सैनिक भी इस कब्रिस्तान में दफन हैं। वर्ष 1899 से लेकर 1902 तक हुए वार ऑफ बॉयर के दौरान अंग्रेज सैनिकों ने आसपास के क्षेत्रों में युद्ध लड़ा था। युद्ध के दौरान कई सैनिक शहीद हुए। वहीं अंग्रेजों ने दुश्मन देशों के सैनिकों को बंदी भी बनाया। इन सैनिकों को ब्रिटिश सरकार के अधीन देशों में भेजा, उसी के तहत अंबाला में भी बंदी यूरोपियन सैनिक भेजे गए थे। इसके साथ ही प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में शहीद हुए अंग्रेज सैनिकों व अफसरों को भी यहां पर दफनाया गया था।
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