पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आनन-फानन में शुरू किए करोड़ों रुपये के सीवेरेज ट्रीटमेंट प्लांट प्रोजेक्ट को करारा झटका लगा है।
इस परियोजना के सिरे चढ़ने की संभावनाएं भी बेहद कम रह गई हैं। क्योंकि, इस प्रोजेक्ट के लिए तत्कालीन नगर परिषद अंबाला (अब म्यूनिसिपल कारपोरेशन) के अफसरों ने जिस जमीन का चयन किया था, उसका केस अंबाला प्रशासन हार गया है।
उल्लेखनीय है कि तत्कालीन अफसरों ने धक्के से करीबन तीन एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर वहां सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम शुरू करवा दिया था।
मगर, इस जमीन पर कुछ लोगों का सन 1930 से कब्जा था। इसकी परवाह किए बिना तत्कालीन लोकसभा चुनाव के दबाव में संबंधित साइट पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम तेजी से शुरू कर दिया गया।
इसकी जानकारी लौटने पर पीड़ित पक्ष को हुई, तो उसने जमीन वापस लेने के लिए स्टेट अफसर और नगर परिषद अंबाला के खिलाफ कोर्ट में केस कर दिया। कोर्ट ने वर्ष 2012 में स्टे दे दिया। इसके बाद प्लांट का काम रुक गया। अब अदालत ने इस मामले में अपना फैसला दे दिया है।
हरियाणा सरकार की नहीं है जमीन
पीड़ित पक्ष धक्के खाने के बाद अपने जमीन संबंधी दस्तावेज लेकर नवंबर 2009 में अदालत चला गया था। अदालत में पीड़ित पक्ष के कृष्ण कुमार, लक्ष्मी नारायण और रिपुदमन ने जमीन को अंबाला प्रशासन से वापस दिलाने के लिए याचिका की।
अब अदालत ने इस मामले में फैसला दिया है कि जिस जमीन पर प्रशासन सीवेरज ट्रीटमेंट प्लांट बनवा रहा है, उस पर पीड़ित पक्ष का बहुत पुराना कब्जा है। यह जमीन न तो हरियाणा सरकार की है और न ही म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन अंबाला की। इस फैसले के बाद म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन अंबाला के अफसर भी पसोपेश में हैं।
ये था प्रोजेक्ट
ये परियोजना मिनिस्ट्री ऑफ अर्बन डेवलपमेंट डिर्पाटमेंट के अंतर्गत थी। इसको इसी मंत्रालय के अधिनस्थ एनबीसीसी (नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटड) को बनाना था। हरियाणा अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड को नोडल एजेंसी बनाया गया था।
चेन्नई की एक कंपनी को इसके निर्माण का ठेका दिया गया था। इसकी अनुमानित लागत करीब दस करोड़ रुपये थी। परियोजना में इस जमीन का मालिक तत्कालीन नगर परिषद अंबाला (एमसीए) को दिखाया गया था।
इसके जरिए अंबाला कैंट के सीवरेज को बड़े पाइपों के जरिए रंगिया मंडी के पास बनने वाले सीवरेजट ट्रीटमेंट प्लांट तक लाना था। यहां इस गंदे पानी को ट्रीट करके उसका इस्तेमाल सिंचाई व अन्य कामों के लिए किया जाना था।
ऐसे बर्बाद होंगे करोड़ों
वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव थे। इसलिए आनन-फानन में इस परियोजना को शुरू किया गया। वर्ष 2012 में इस पर स्टे लगने तक यहां करीब दो करोड़ का निर्माण हो चुका था।
इसके साथ ही करीब दो करोड़ से अधिक की मशीनरी, बड़े पाइप और अन्य निर्माण सामग्री यहां तीन सालों से पड़ी है। इनमें से बहुत सारा सामान खराब हो चुका है, तो बहुत सारा चोरी हो रहा है। अब प्रशासन केस हार गया है, तो यह करोड़ों रुपये बर्बाद हो जाएंगे।
अफसरों के खिलाफ होनी चाहिए कार्रवाई
ये परियोजना मैं पूर्व केंद्र सरकार से जनहित के लिए अंबाला लेकर आई थी। अंबाला के तत्कालीन लापरवाह अफसरों की वजह से ये परियोजना विवादों में घिरी। मेरा काम परियोजना लाना था।
उसके लिए उचित जगह का चुनाव करना प्रशासनिक अफसरों की जिम्मेदारी थी। ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मौजूदा सरकार को अब इस परियोजना में मध्यस्थता करके किसी भी तरह जनहित में इसे सिरे चढ़ाना चाहिए।
-कुमारी सैलजा, राज्यसभा सांसद-
करोड़ों बर्बाद का जिम्मेदार कौन
इतने महत्वकांक्षी परियोजना को शुरू करने से पहले किस जमीन का चयन किया जा रहा है। ये देखना अफसरों के साथ तत्कालीन मंत्री की भी जिम्मेदारी थी। अब इस परियेाजना पर करोड़ों लग चुके हैं और यह बर्बाद हो रहे हैं, आखिरकार इसका जिम्मेदार कौन है?
-अनिल विज, खेल एवं स्वास्थ्य मंत्री-
अफसरों की जिम्मेदारी तय हो
ये एक महत्वाकांक्षी परियोजना थी। इस पर करोड़ों खर्च हो गए हैं। आज तक इस प्रोजेक्ट का जनता को कोई लाभ नहीं हुआ। अफसरों ने धक्के से विवादित जमीन पर ये परियोजना कैसे शुरू कर दी। अफसरों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। मौजूदा सरकार को इस परियोजना को टेकओवर करके बीच का रास्ता निकालना चाहिए। अन्यथा करोड़ों बर्बाद हो जाएंगे।
-चंद्र कुमार, अश्वनी सालवान व सुनील वर्मा समाज सेवी-