गिद्ध, चील और कौए की संख्या को प्रभावित करने वाली दो दवाओं पर भारत सरकार ने रोक लगा दी है। इनकी संख्या कम होने का एक कारण पशुपालन के क्षेत्र में उपयोग होने वाली दो दवाओं को बताया है। कीटोप्रोफैन और एसीक्लोफेनाक नाम की इन दवाओं की बिक्री और इस्तेमाल पर 31 जुलाई से भारत सरकार ने बंद कर दिया है।
इन दवाओं को देश में पशुओं में एक दर्द निवारक (पेन किलर) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके इस्तेमाल को बंद करने की अधिसूचना भारत सरकार ने जारी की। इसके लिए पशुपालन के क्षेत्र में उपचार करने वाले संस्थान भी सक्रिय हो गया। हरियाणा में भी वेटरनरी चिकित्सालयों ने इन दोनों दवाओं का इस्तेमाल तत्काल बंद करने के आदेश दिए हैं।
गौरतलब है कि भारत में गिद्धाें की एशिया की लगभग 80 प्रतिशत आबादी पाई जाती है। इसमें भी नौ प्रजातियों में से चार विलुप्त होने के कगार पर हैं। नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पशु प्रभाग के पूर्व उप महानिदेशक और जम्मू कश्मीर स्थित शेर ए कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बीएन त्रिपाठी बताते हैं कि भारत सरकार ने इन दो दवाओं को बंद करने की अधिसूचना जारी कर दी है।
मांसाहारी पक्षियों की आबादी घटा रही थी ये दवाएं
दरअसल गाय भैंसों या अन्य पशुओं में बीमारियां होने पर इन दोनों दवाओं को पेन किलर के रूप में दिया जाता था। अब अगर गिद्ध, चील या कौए अगर इस दवा को लेने वाले पशु का मांस का सेवन करते तो उनकी जान चली जाती। ऐसे धीमे धीमे कर गिद्धाें और चील की आबादी पर असर पड़ा। दिल्ली हाईकोर्ट में मामले में एक जनहित याचिका अधिवक्ता गौरव ने लगाई। इसके बाद इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आदेश दिया। अब आदेश के अनुरूप स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 31 जुलाई को भारत सरकार ने अधिसूचना जारी की है।
पहले डिक्लोफिनाक को भी किया था बंद
हिसार स्थित लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के डायरेक्टर रिसर्च डाॅ. नरेश जिंदल से जब इस मामले पर बात की गई तो उन्होंने बताया कि इन दो दवाओं से पहले डिक्लोफिनाक नाम की दवा आती थी। उसका प्रयोग हल्के बुखार या पेन किलर के रूप में किया जाता था। इन दवाओं का सेवन करने के बाद अगर पशु मर जाता है तो चील या गिद्ध उसे खाते थे। इससे उन पर प्रभाव पड़ता था। वर्तमान में बैन की गई दोनों दवाएं भी डिक्लोफिनाक से ही मिलती जुलती हैं। अब इनका प्रयोग वर्जित रहेगा।