देश की आजादी के लिए अपनी जान देने वाले 1857 के शूरवीरों व अन्य शहीदों की याद में बनने वाले शहीद स्मारक पर राजनीति हावी है। अब पांच साल बाद सरकार ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना का डिजाइन नहीं बदल दिया है बल्कि पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जो डिजाइन इस शहीद स्मारक का बनवाया गया था, उसको लगभग पूरी तरह से बदल दिया गया है। इन पांच सालों में इस शहीद स्मारक का राजनीतिकरण तो हुआ, लेकिन 22 एकड़ में लगभग 220 करोड़ से बनने वाली ये परियोजना फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई।
सालों से बस लटकती रही शहीद स्मारक की योजना
करीब पांच साल पहले कांग्रेस कार्यकाल में नेशनल हाइवे नंबर एक के किनारे कैंट में शहीद स्मारक के निर्माण की योजना बनाई गई थी। गदर के म्यूटिनिटी रिकार्ड के मुताबिक 1857 की पहली क्रांति मेरठ से पहले अंबाला में ही मानी जाती है। इसलिए अंबाला में इस विशाल प्रोजेक्ट को तैयार करने के लिए पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कार्यकाल में इस परियोजना की शुरुआत हुई थी। तत्कालीन डीसी समीर पाल सरो ने इस परियोजना को आगे बढ़ाते हुए शहीद स्मारक एवं पार्क का डिजाइन लखनऊ की एक निजी एजेंसी के विशेषज्ञों से तैयार करवाया था। उस वक्त भी इस डिजाइन पर लाखों रुपये खर्च किए गए थे। डिजाइन के बाद इसी डीपीआर भी तैयार करवाई गई। लेकिन वक्त गुजरता गया और कांग्रेस सरकार भी बदल गई। नई भाजपा सरकार में इस परियोजना को मंत्री एवं कैंट विधायक अनिल विज ने इस परियोजना को यह कहते हुए आगे बढ़ाया कि वे ही अंबाला में इस तरह की स्मारक की आवाज बुलंद करते रहे हैं, जिस पर ये परियोजना तैयार की गई। उसके मंत्री विज ने मई 2015 को सीएम मनोहर लाल खट्टर से इसका शहीद स्मारक का शिलान्यास करवा दिया। लेकिन इसे भी डेढ़ साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है और अब इस शहीद स्मारक का डिजाइन ही बदल दिया गया है।
कुछ ऐसा था पुराने डिजाइन में खास
कांग्रेस के कार्यकाल में करीब 22 एकड़ में बनने वाले इस शहीद स्मारक में छह थिमेटिक पार्क तैयार किए जाने थे। इस में ब्रिटिश शासकों के आने से पहले, ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियां, अंबाला से उठी क्रांति की चिंगारी, शहीद राव तुलाराम के जीवन के बारे तथा हरियाणा के शहीदों के बारे में जानकारी, दिल्ली, मेरठ, लखनऊ में हुई क्रांति, 1857 की क्रांति का ब्रिटिश शासकों पर क्या असर पड़ा, इसके बारे में जानकारी शामिल की जानी थी। इसके अलावा योजना के तहत पार्क में मेमोरियल प्लेटफार्म (दो ऊंचे टावर समेत), प्लेटफार्म के नीचे म्यूजियम की दीवारों पर शहीदों के नाम, आर्काइव लाइब्रेरी, आडिटोरियम, हेलीपैड, कांफ्रेंस हाल, फूड कोर्ट, कवर्ड पार्किंग, रिसेप्शन, चिल्ड्रन पार्क शामिल रहे। जिस डिजाइन के साथ तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस योजना का खाका खींचा था, उसे अब करीब पांच साल के बाद अब बदल दिया गया है। अभी तक योजना के नाम पर एक ईंट तक नहीं लग पाई है, जबकि यह अभी भी कागजों में ही उलझी हुई है।
अब मंत्री ने की नए डिजाइन की समीक्षा
अब हरियाणा के स्वास्थ्य एवं अभिलेखागार मंत्री अनिल विज ने चंडीगढ़ में इस नए डिजाइन की समीक्षा की है। मंत्री विज ने कहा कि कहा कि अंबाला में बनाये जा रहा शहीदी स्मारक एक राष्ट्रीय स्मारक के तौर पर निर्मित किया जाएगा, जिसमें 1857 से बहादुरशाह जफर तक के पूरे इतिहास का ऑडियो- विडियो माध्यम से दर्शाया जाएगा। बैठक के दौरान मुख्य वास्तुकार संगीता मोगिंया, वास्तुकार रेनू खन्ना द्वारा प्रस्तावित शहीदी स्मारक की साइट प्लान दिखाई गई।
मंत्री ने कहा कि इसमें प्रथम स्वतंतत्रा संग्राम की घटनाओं और उसके बाद से बहादुरशाह जफर तक की सभी घटनाओं को विस्तार से दिखाया जाएगा। इसमें रानी झांसी, टांत्या टोपे सहित सभी शहीदों की प्रतिमाओं को लगाया जाएगा ताकि दर्शकों को उसी प्राचीन समय की याद दिलाई जा सके। उन्होंने कहा कि 1857 में सबसे पहले अंबाला से ही आजादी की लड़ाई शुरू हुई थी। विज ने बताया कि इस स्मारक में फूड कोर्ट, सूचना केंद्र, प्रदर्शनी स्थल, पुस्तक स्टोर, तालाब, ऑडिटोरियम सहित करीब 2000 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी। उन्होंने कहा कि इस स्मारक में अंबाला से लेकर हरियाणा तथा उत्तरप्रदेश सहित अन्य सभी स्थानों की घटनाओं का भी विस्तृत वर्णन किया जाएगा।
एमसीए को ट्रांसफर हुई जमीन
साल-दर-साल योजना लेट होने के बाद अब एमसीए को करीब बाइस एकड़ जमीन ट्रांसफर की गई है। उल्लेखनीय है कि एमसीए के अधीन यह जमीन न होने के कारण यह योजना लटकी रही, जबकि इसकी चहारदीवारी के लिए भी पहले निर्देश दिए जा चुके हैं। हालांकि भाजपा कार्यकाल के इस शहीद स्मारक के लिए भूमि पूजन व शिलान्यास तो हो चुका है, लेकिन मामला इससे आगे नहीं बढ़ पाया। दूसरी ओर इसी स्थान पर गंदगी पसरी है, जबकि अब मंत्री अनिल विज ने इस जगह की चहारदीवारी के आदेश दिए हैं।
यह चाहती है जनता
कैंट के रहने वाले चंद्र अरोड़ा, गिरीश आर्य, आनंद मोहन शुक्ला, निर्मल बवेजा, रुपेश कुमार, मनिंदर सिंह, रामेश्वर दास, घनश्याम, अनिल अरोड़ा, राजवंत सिंह का कहना है कि शहीद स्मारक की योजना बढ़िया है, बल्कि यह योजना लगातार लटकती जा रही है। ऐसा लग रहा है कि इस पर राजनीति की जा रही है। युवा पीढ़ी के लिए इस तरह की योजनाएं जहां काफी लाभप्रद हैं, वहीं बच्चों के लिए यह एक तरह से प्रेरणादायक रहेंगी। ऐसी योजनाओं को उलझाने की बजाय, इसे तेजी से पूरा किया जाना चाहिए। पांच साल के करीब हो चुके हैं, योजना अभी भी कागजों तक ही सीमित है, जबकि इसे इतने समय में तो पूरा हो जाना चाहिए।