अंबाला सिटी। लोकसभा चुनाव में अंबाला सीट पर कांग्रेस को मिली करारी
शिकस्त के बाद कांग्रेस में जबरदस्त घमासान मच गया है। लोकसभा क्षेत्र के
सभी नौ विधानसभा क्षेत्रों के साथ-साथ यहां अंबाला कैंट और सिटी में
कांग्रेसी पार्षदों के वार्डों में भी कांग्रेस की लुटिया डूब गई है।
इन
सभी वार्डों के बूथों से कांग्रेस अपेक्षाकृत हार गई है। ऐसा तब हुआ है जब
ट्विनसिटी में म्यूनिसिपल कारपोरेशन अंबाला (एमसीए) के 20 वार्डों में से
16 वार्डों पर कांग्रेसी पार्षदों का ही जलवा है।
दस महीने में खिसक गया वोट बैंक
2
जून, 2013 को एमसीए के 20 वार्डों में चुनाव थे। इन वार्डों में भाजपा,
इनेलो, बसपा, कांग्रेस और आजाद 180 प्रत्याशियों ने पार्षद पद के लिए
किस्मत अजमाई थी लेकिन 20 वार्डों के 16 वार्डों में कांग्रेस समर्थित
पार्षदों ने जबरदस्त लीड के साथ बढ़त हासिल कर एमसीए पर पूरी तरह अपना
कब्जा किया। अब केवल दस महीनों में ही इन सभी पार्षदों के वार्डों में
कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया जिसे लेकर खुद कांग्रेसी पार्षद भी हैरान
हैं।
इस्तीफा दें शहरी अध्यक्ष, हार पर मंथन आज
पार्षदों के वार्डों
में कांग्रेस की लुटिया डूब गई, लेकिन कई पार्षदों ने कांग्रेस के सभी
शहरी जिलाध्यक्षों से इस्तीफे की मांग की है। कई पार्षदों ने कैंट और सिटी
के कांग्रेस जिलाध्यक्षों से नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की मांग की है।
खैर, दूसरी ओर लोस चुनाव में अंबाला में हार कैसेे हुई? इसके लिए कैंट और
सिटी कांग्रेस भवनों में बुधवार को कांग्रेसियों ने बैठक बुला रखी है। इन
मीटिंगों में स्थानीय नेता व वर्कर हार के कारणों पर समीक्षा करेंगे।
दिग्गज एकजुट होते तो पिटती न कांग्रेस
हार
की बड़ी वजह है संगठन की कमजोरी। यहां शहर में कांग्रेस का संगठन ही मजबूत
नहीं है। फूट इतनी हावी रही कि कांग्रेसी वर्करों में उत्साह ही नहीं था।
हालात इतने खराब हो गए थे कि कई जगह तो कांग्रेस वर्करों ने बस्ते तक नहीं
पकड़े थे। संगठन की कमजोरी और आपसी फूट की वजह से कांग्रेस हार गई।
सोनिया रानी, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड एक
जिन
दिग्गजों को वर्करों ने ताकत दी, वे ही चुनावों से पहले मैदान छोड़कर भाग
गए। अन्य दिग्गजों का आपस में इतना टकराव था कि उसे देखकर वर्कर ही एकजुट
नहीं हो पाए। वर्करों की पूछ ही खत्म हो गई थी। ऐसे में हार तो निश्चित ही
थी।
दर्शना मेहता, कांग्रेस पार्षद, वार्ड दो
जिलाध्यक्षों से
लेकर आला नेताओं तक आपसी फूट ने ही कांग्रेस की लुटिया डूबो दी। वर्करों ने
मन लगाकर काम ही नहीं किया। बड़ी मुश्किल से दम लगाया, तब जाकर कैंट और
सिटी में सम्मानजनक स्थिति मिली है, वरना ये भी नहीं मिलनी थी। पार्टी को
यह सबकुछ देखना पड़ेगा।
रमेश लाल मल, मेयर एवं कांग्रेस पार्षद, वार्ड तीन
जब
तक आला नेता ही आपस में लड़ते रहेंगे तो निचले वर्करों का क्या हाल होगा।
वर्कर भी अपने-अपने नेताओं के साथ बंट जाएंगे, कोई उन्हें पूछेगा नहीं? यह
सब चुनाव में भी हुआ है। वर्करों को पहले ही पता था, इस बार ऐसा ही होने
वाला है।
बृजलाल सिंगला, कांग्रेस पूर्व पार्षद, वार्ड चार
वर्कर
पार्टी की रीढ़ की हड्डी होते हैं लेकिन जब उनकी अनदेखी होती है, तो उनका
उत्साह खत्म हो जाता है। दूसरा, गुटबाजी से हमेशा पार्टी को नुकसान
पहुंचता है। मुझे लगता है यही दोनों कारण कांग्रेस को अंबाला में ले डूबे।
रूपम गुगलानी, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड पांच
इस
चुनाव में पूर्व सांसद सैलजा मैडम की बेरुखी ने सारा काम खराब कर दिया।
दूसरा शहर विधायक विनोद शर्मा भी चुनाव से पहले पार्टी छोड़ गए। इन दोनों
दिग्गज नेताओं की वजह से अंबाला में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा। इसीलिए हार
तो इस बार निश्चित ही लग रही थी।
पवन अग्रवाल, कांग्रेस पार्षद, वार्ड छह
पूरे
देश में मोदी इफेक्ट ने कांग्रेस की कमर तोड़ रखी थी। अंबाला में भी इसका
बहुत ज्यादा असर था। रही-सही कसर यहां हमारे दिग्गज नेताओं की आपसी नाराजगी
ने पूरी कर दी। इसी का खामियाजा अंबाला में कांग्रेस ने भुगता है और हम
हार गए।
दलजीत सिंह भाटिया, कांग्रेस पार्षद, वार्ड सात
वर्कर
निराश थे क्योंकि दिग्गजों की फूट से वे टूट चुके थे। यही वजह थी कि वे
कांग्रेस के विकास और जनहित की नीतियों को जनता तक सही ठीक ढंग से नहीं
पहुंचा पाए। इसीलिए हार का मुंह देखना पड़ा।
हिम्मत सिंह, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड नौ
बड़े
नेता आपस में भिड़ते रहे। एक-दूसरे की परियोजनाओं में अड़चन डालते रहे।
वर्कर काफी समय से यह देख हे हैं। वर्करों को कोई पूछने वाला ही नहीं था
इसीलिए कांग्रेस की जीत इस बार दूर ही लग रही थी।
हरदीप कौर, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड दस
कांग्रेस
का प्रत्याशी बहुत देरी से घोषित हुआ, समय बहुत कम था। होमवर्क पूरा नहीं
हो पाया। कुछ पार्टी आपसी गुटबाजी से जूझ रही थी। कई तरह के फैक्टर रहे,
जिसने जीत को कांग्रेस से दूर कर दिया।
दिलीप चावला बिट्टू, कांग्रेस पार्षद, वार्ड ग्यारह
कांग्रेसी
वर्कर काम करना चाहते थे मगर वे यही समझ नहीं पा रहा था कि वे किस गुट
में रहकर किसके लिए काम करें। वर्कर दिग्गजों की लड़ाई में उलझ गए और चुनाव
में कांग्रेस हार गई।
जरनैल सिंह माजरा, कांग्रेस पार्षद, वार्ड बारह
हार
की कई वजह हैं, मगर अंबाला में दो चीजों एक तो बड़े नेताओं के टकराव और
दूसरा अफसरों की मनमानी ने काम खराब किया। अफसर पहले और आज भी जनता के काम
को लटकाकर रखते हैं। इसी बात से जनता नाराज थी, अफसर आज भी वही ही काम कर
रहे हैं।
दुर्गा सिंह अत्री, सीनियर डिप्टी मेयर, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड तेरह
विकास
की कमी भी कांग्रेस को ले डूबी है। हमारे दिग्गज नेता परियोजनाएं तो खूब
लेकर आए, लेकिन सिरे कोई नहीं चढ़ी। आज तक वार्डों में बुनियादी समस्याओं
से लोग जूझ रहे हैं, इसीलिए उनका गुस्सा कांग्रेस के प्रति काफी बढ़ चुका
था और यह गुस्सा उन्होंने चुनाव में उतार दिया।
स्वर्ण कौर, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड पंद्रह
एक
तो हवा का रुख ही इस बार कांग्रेस के खिलाफथा। जो जन विरोधी निर्णय यूपीए
ने लिए उसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा। जबकि कांग्रेस ने हमेशा
जनहित में महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं। दूसरा ऐन वक्त पर सैलजा मैडम की
बेरुखी, वर्करों में उत्साह की कमी, बड़े नेताओं में एकजुटता का अभाव इस
तरह के कई कारणों से कांग्रेस को हार झेलनी पड़ी।
चित्रा सरवारा, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड सोलह
देखों
काम में कोई कमी नहीं थी। परियोजनाएं खूब आईं, लेकिन अब ये सिरे क्यों
नहीं चढ़ी, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पब्लिक को इससे कोई मतलब नहीं।
अफसरों ने सुनना बंद कर दिया, लोगों के काम लटकने लगे। अफसरों की मनमानियां
हावी रहीं लेकिन इसका गुस्सा लोगों ने कांग्रेस पर उतार दिया।
सुधीर जयसवाल, डिप्टी मेयर, कांग्रेसी पार्षद, वार्ड 19
जो
भी हुआ वह जनता का गुस्सा था। पार्टी के आला नेताओं ने इसकी नैतिक
जिम्मेदारी ली है, हम भी हार की जिम्मेदारी लेते हैं और जनादेश को स्वीकार
करते हैं। गुटबाजी का मुद्दा दूसरी बात है।
हरीश सासन, जिलाध्यक्ष, अंबाला शहर
हार
की जिम्मेदारी तो सभी की बनती है। परियोजनाएं तो आईं, मगर सिरे नहीं चढ़
पाई। सैलजा मैडम के प्रोजेक्ट में राज्य सरकार टांग अड़ाती रही, जनता नाराज
होती रही। विकास के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ, इसीलिए जनता का गुस्सा तो
उतरना ही था। हम हार पर मंथन करेंगे।
शेर सिंह शेरा, जिलाध्यक्ष, अंबाला कैंट