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मां! मेरा क्या कसूर, क्यों किया मुझे अपनों से दूर

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राजीव ऋषि
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अंबाला सिटी। मां मेरा क्या कसूर, क्यों किया किया खुद के साथ मुझे अपनों से दूर। कुछ ऐसा ही सवाल होगा नौ माह गर्भ में रहने के बाद ठुकराए और फेंके गए उन मासूमों का। हालांकि आंकड़ों में कमी जरूर आई है, लेकिन इस तरह के केस अभी भी थमने का नाम नहीं लिए रहे।
दरअसल, बेटे की चाह तो कभी लोकलाज ने मातृत्व को शर्मसार किया है। शहर में कभी गटर, कभी कूड़े के ढेर, कहीं सड़क किनारे तो कहीं कूड़ेदान में मानव भ्रूण और नवजात मिलने के मामले सामने आए हैं। भ्रूण और जिंदा मिले नवजात को सूअर व कुत्तों द्वारा नोचते कई बार देखा गया। कहीं कोई लोकलाज में अपनी कोख को कलंकित कर रहा है तो कहीं बेटे की चाह में बेटियां बलि चढ़ रही हैं।
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नहीं कोई ट्रैकिंग सिस्टम
अहम पहलू ये है कि जिन महकमों पर ऐसी शर्मसार करने वाली सामाजिक कुरीति पर काबू करने की जिम्मेदारी हे, वे राम भरोसे हैं। स्वास्थ्य विभाग और पुलिस के पास निपटने के लिए कोई ट्रैकिंग सिस्टम नहीं है, न कोई योजना है। यही कारण है कि 8 साल में हुई तमाम घटनाओं में से केवल दो सुलझी है। एक मामले में बच्चा कोर्ट परिसर में रखती महिला सीसीटीवी में कैद हो गई थी।
2012 से अब तक का रिकार्ड
- 2012 में 7
- 2013 में 2
- 2014 में 1
- 2015 में 5
- 2016 में 3
- 2017 में 3
-2018 में 2
-2019 में 3
- 2020 में 2 केस दर्ज किए गए
ये हैं धारा 318, 317 व सजा
आईपीसी की धारा 318 के अनुसार मृत शरीर के गुप्त व्ययन द्वारा जन्म छिपाने का प्रयास। इसके अनुसार यदि कोई शिशु के शरीर को गुप्त रूप से गाड़कर या व्ययन करके, चाहे शिशु की मृत्यु जन्म से पूर्व या बाद में हुई हो। ऐसा करेगा तो इस अपराध में उसे दो साल की कैद, जुर्माना या दोनों भरना पड़ेगा, यह अपराध गैर जमानती की श्रेणी में आता है। 317 के अनुसार बच्चे के जायज संरक्षक द्वारा 12 साल से कम उम्र के बच्चे को छोड़ने की नीयत से खुला छोड़ देना चाहे वह जिए या मरे। इसमें सात साल की कैद, जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान है।
ऐसी घटनाओं से समाज की मनोस्थिति का पता चलता है। आज जहां कुछ बेटियां दूसरों के लिए उदाहरण पेश कर रही हैं। वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनकी विकृत सोच की वजह से एसी समस्या आ रही है। आज लड़के और लड़की में कोई असमानता नहीं है, दोनों बराबर हैं।
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- डॉ. कुलदीप सिंह, मनो विश्लेषक
ऐसे केसों को सुलझाना काफी मुश्किल होता है लेकिन प्रयास नहीं छोड़े गए हैं। सरकारी के अलावा प्राइवेट अस्पताल और दाइयों का रिकॉर्ड देखा जाता है। आरोपी लड़के की चाह में ऐसा करते हैं या फिर कुंवारी लड़कियां गलती छिपाने के लिए। आरोपी इसलिए भी पहचान में नहीं आते, क्योंकि वे भ्रूण और नवजात को घर से काफी दूर ले जाकर फेंकते हैं, ताकि पुलिस उन तक न पहुंच सके।
- हामिद अख्तर, एसपी अंबाला।
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