अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला सिटी। सुल्लर स्थित गोशाला में गायों की हालत बद से भी बदतर है। गोशाला यहां रह रही गायों के लिए कब्रगाह बनती जा रही है। यहां गायों के चारे के लिए यदि कोई दान दे देता है तो उन्हें खाने के लिए चारा नसीब हो जाता है, नहीं तो गायों को सूखे भूसे से काम चलाना पड़ता है। इसके चलते गायें काफी कमजोर हो गई हैं और कुपोषण का शिकार होकर दम तोड़ रही हैं। यहां तैनात डॉक्टरों का कहना है कि चारा तो दूर, उनके पास इलाज के लिए दवाएं तक नही हैं। बार-बार लिखकर देने के बावजूद प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा। इतना ही नहीं गोशाला के लिए बनाई गई कमेटी का भी कोई सदस्य कभी आकर नहीं देखता कि यहां किस चीज की जरूरत है। यहां काम करने वाले कर्मचारी भी एक-एक करके काम छोड़कर चले गए हैं। गोशाला में अनियमितताओं को लेकर एसडीएम सत्येंद्र सिवाच ने पशुपालन विभाग के अधिकारियों के साथ मौके पर दौरा किया था, अब इस मसले पर सोमवार को बैठक होगी जिसमें गोशाला संचालन को लेकर निर्णय लिया जाएगा।
सुल्लर स्थित गोशाला में इस समय करीब 350 गायें, नंदी व बछड़े हैं। इनमें से मात्र 20 दुधारू गायें हैं। यह भी कुपोषण का शिकार होने के चलते मात्र 15-17 लीटर दूध ही प्रतिदिन दे पाती हैं। इसे बेचकर होने वाले मुनाफे से गोशाला का खर्च चल पाता है। इसमें बिजली बिल व कर्मचारियों की तनख्वाह भी शामिल है। ऐसे में गायों के लिए चारा खरीद पाना तो नामुमकिन ही है। गोशाला के मैनेजर गुरतेज व डा. रणजीत सिंह ने बताया कि यहां एक ही शेड है जो गायों को रखने के लिए नाकाफी है। इसकी कैपेसिटी मात्र 100 गायों की है। एक अन्य शेड का निर्माण करीब 6 माह पहले शुरू हुआ था लेकिन आज तक पूरा न होने के चलते पूरे गोशाला में दलदल बनी हुई है जिससे बीमार गायों का इलाज करना भी कई बार असंभव हो जाता है। लेबर न होने के चलते बीमार गायों को दलदल से नहीं निकाला जा सकता। उसी समय उनका इलाज तो किया जाता है लेकिन वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पातीं जिसके चलते औसतन प्रतिदिन 2-3 गायों की मौत हो जाती है।
3 महीने से नहीं मिली कर्मचारियों को तनख्वाह
गोशाला के निर्माण के समय यहां 25 कर्मचारी तैनात किए थे लेकिन समय पर तनख्वाह न मिलने के चलते एक-एक करके कर्मचारी काम छोड़कर जाते रहे। इस वक्त मात्र सात लोग गायों की देखभाल कर रहे हैं जो नाकाफी है। गोशाला के मैनेजर गुरतेज के अनुसार कर्मचारी तो कर्मचारी, गोशाला के लिए बनाई कमेटी भी हिम्मत हार चुकी है और एक-एक करके इसके भी सदस्य सदस्यता छोड़ गए हैं। दूध बेचकर जो आमदनी होती है या फिर कोई दान दे जाता है उससे कुछ चारा खरीद लिया जाता है।
प्रतिदिन हरे चारे की लागत 100 क्विंटल, मिलता है 15 क्विंटल कभी-कभी
मैनेजर गुरतेज के अनुसार गोशाला में मौजूद 350 गायों के लिए रोजाना करीब 100 क्विंटल हरे चारे की आवश्यकता होती है लेकिन प्रशासन से कोई मदद न मिलने के चलते चारा नहीं मिल पाता है। कभी कोई दानवीर अगर दान कर जाए तो ही मात्र 40 क्विंटल हरा चारा ही उपलब्ध हो पाता है जिसे वह लोग तीन दिन तक चलाते हैं। कई बार तो कई दिन तो कोई दानवीर भी नहीं आता तो ऐसे में सूखे भूसे से ही काम चलाना पड़ता है जिससे गायों की भूख पूरी नहीं मिट पाती और वह कुपोषण का शिकार हो जाती हैं।
इलाज के लिए डॉक्टर तो हैं लेकिन दवाइयां नहीं
सुल्लर की गोशाला में अब भी चार गायें बीमार हैं जो किसी भी वक्त दम तोड़ सकती हैं। गायों की देखभाल का जिम्मा डॉक्टरों पर भी है लेकिन हशिए पर दिखाई दे रहे पशुपालन विभाग के कारण यहां दवाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं जो भी राम भरोसे ही है। यहां दो डॉक्टर लगाए तो गए हैं लेकिन वह एडिशनल चार्ज पर हैं जिससे वह ज्यादा समय यहां नहीं दे पाते। डॉ. रणजीत सिंह ने बताया कि यहां दौरे तो मंत्री-विधायकों के होते रहते हैं लेकिन सिस्टम नहीं बदल पाया। न तो गायों के लिए हरे चारे की व्यवस्था है न ही दवाइयों की। कभी-कभी तो वे लोग अपनी जेब से पैसे डालकर दवाइयां ले आते हैं लेकिन रोज-रोज लाना उनके लिए भी मुमकिन नहीं है।
मौके पर निरीक्षण किया था, मगर गायों की देखभाल का जिम्मा गोशाला कमेटी का है। विभाग द्वारा गायों का उपचार किया जा रहा है।
-डा. प्रेम सिंह, उप निदेशक, पशुपाल विभाग, अंबाला।