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1050 बसों का निरीक्षण, 90 फीसद अनफिट, ‘बेफिक्रे’ स्कूल

Fri, 20 Jan 2017 12:46 AM IST
अमर उजाला/ब्यूरो/अंबाला
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 उत्तरप्रदेश के एटा में अनफिट बस हादसे में 13 मासूम बच्चों की जान चली गई। स्कूलों की अनफिट बसों का ये मामला केवल उत्तरप्रदेश में ही नहीं, बल्कि हरियाणा में भी प्राइवेट स्कूलों की इन बसों की हालात बेहद खराब है। अंबाला समेत प्रदेशभर के अन्य जिलों में भी प्राइवेट स्कूल अपनी बसों को लेकर बिल्कुल भी संजीदा नहीं रहते। हैरत की बात यह कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ऐसे ही हादसों पर खुद संज्ञान ले चुका है और इसी के चलते वर्ष 2009 में एक जनहित याचिका भी हाईकोर्ट में लगाई गई, जो अभी तक विचाराधीन है।
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इतना ही नहीं सरकार ने इसी बाबत संरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी भी तैयार की हुई है। लेकिन न तो अफसरगण इस पॉलिसी के तहत अपना दायित्व बखूबी निभाते हैं और न ही प्राइवेट स्कूल हाईकोर्ट की इस पॉलिसी के बाद गाइडलाइंस को फॉलो करते हैं। नतीजतन अनफिट स्कूल बसें सड़कों पर सरपट दौड़ रही है और इससे स्कूली छात्रों की जिंदगी हमेशा दांव पर लगी रहती है।


हाईकोर्ट चिंतित, पर स्कूल संचालकों व अफसर बेफिक्र
अनफिट स्कूल बसों से लगातार होने वाले हादसों को लेकर वर्ष 2009 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने खुद संज्ञान लिया और सुरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी को प्रदेशभर में लागू करवाने के आदेश दिए। इस पॉलिसी को प्रदेश में लागू करने के बाद इस पर निगरानी के लिए स्टेट, जिला और ब्लाक स्तर पर कमेटियों का गठन किया गया। इस निगरानी कमेटी में परिवहन विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को चेयरमैन बनाया गया, जबकि ट्रांसपोर्ट कमिश्नर, एकसाइज एंड टेक्सेशन कमिश्नर, डीजी स्टेट ट्रांसपोर्ट, डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, डीजी सेकेंडरी एजूकेशन, डीजी एलिमेंट्री एजूकेशन व डीजी हायर एजूकेशन इस कमेटी में सदस्य हैं। इसी तरह से जिला स्तरीय निगरानी कमेटी के चेयरमैन डीसी अंबाला हैं, जबकि एसपी, आरटीए, जीएम रोडवेज व जिला शिक्षा अधिकारी बतौर सदस्य शामिल है। इसी तरह ब्लाक लेवल निगरानी कमेटी में एसडीएम चेयरमैन है, जबकि डीएसपी, आरटीए का प्रतिनिधि, बीईओ व जीएम रोडवेज का प्रतिनिधि बतौर सदस्य शामिल हैं।
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इस दौरान सुरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी को प्रदेश में क्रियान्वित करवाने और राज्य से लेकर जिला और ब्लाक लेवल तक इस पॉलिसी के क्रियान्वयन पर निगरानी करवाने के लिए विशेष कमेटियों तक का गठन किया गया। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि हाईकोर्ट ने तो खुद संज्ञान लेकर अपना काम कर दिया। मगर न तो कमेटियों ने अपनी सक्रियता दिखाई और न ही स्कूल संचालकों पर सुरक्षित स्कूल वाहनों को लेकर कोई दबाव बना। आज आलम यह है ये कमेटियां निष्क्रिय हैं और स्कूल संचालक स्कूल बसों के अनफिट मामलों में मनमानियों पर उतारू हैं।


हाईकोर्ट ने आयोग पर जताया भरोसा, ग्राउंड रिपोर्ट दयनीय
हाईकोर्ट के संज्ञान के बाद विचाराधीन जनहित याचिका के दौरान ही स्कूली बच्चों के लिए बनाई गई सुरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी के तहत सभी स्कूली वाहन नियमों के पैमाने पर खरे उतरते हैं या नहीं। इसकी ग्राउंड रिपोर्ट जानने के लिए हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2015 को अफसरों की उक्त तीनों विशेष कमेटियों से अलग हरियाणा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग पर भरोसा जताया और उन्हें प्रदेश भर में इस बारे में ग्राउंड रिपोर्ट देने के आदेश दिए।
प्रदेशभर में आयोग के छह सदस्य विभिन्न टीमों में विभक्त हो गए। इन सदस्यों के निगरानी में इस काम के लिए भी विशेष कमेटी गठित की गई, जिसमें आयोग सदस्य चेयरमैन व एसपी ट्रैफिक, ज्वाइंट डायरेक्टर शिक्षा विभाग, मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर, सहायक आरटीए व डीईओ का प्रतिनिधि बतौर सदस्य शामिल किए गए।
आयोग ने प्रदेशभर के तमाम जिलों में कुछ बड़े व छोटे प्राइवेट स्कूलों का विजिट कर स्कूली बसों का पूरी तरह से निरीक्षण किया। लेकिन उसके बाद जो ग्राउंड रिपोर्ट सामने आई, वो आश्चर्यजनक थी। इस दौरान प्रदेशभर में करीबन 1050 स्कूलों में स्कूली बसों का निरीक्षण किया गया, जिसमें से 90 फीसद बसें मानकों पर खरी नहीं उतरी। इसमें करीबन 65 बसें अंबाला के स्कूलों में भी चेक की गई, लेकिन उनमें भी अधिकतर नियमों पर पूरी तरह से फिट नहीं पाई गई। आयोग ने अपनी इस ग्राउंड रिपोर्ट से हाईकोर्ट को अवगत करवा दिया है और इसी पर मामला अभी भी विचाराधीन है।


ये है स्कूली वाहनों के अनिवार्य नियम
-स्कूली वाहन पीले रंग में पेंट होने चाहिए
-सभी वाहनों में सीसीटीवी कैमरे व पचास दिन की रिकार्डिंग सेव हो
-स्कूली वाहनों में रिफलेक्टिव टेप नियमानुसार लगी हो
-सभी स्कूल वाहनों में स्पीड गवर्नर लगे होने चाहिए 
-सभी स्कूल वाहनों के पीछे 'स्कूल बस' लिखा हो या बस हायर की गई है तो 'ऑन स्कूल ड्यूटी' लिखा होना चाहिए
-सभी स्कूली वाहनों का फिटनेस प्रमाण पत्र होना चाहिए। 
-संबंधित अधिकारी से स्कूल बस अथवा स्कूल वाहन का परमिट होना अनिवार्य है।
-स्कूली वाहन के चालक के पास पांच साल का ड्राइविंग अनुभव होना चाहिए।
-स्कूल वाहन चालक का तीन बार से अधिक चालान न हुआ हो।
-स्कूली वाहनों में चालक के साथ कंडेक्टर जरूर होना चाहिए, जो वाहन में सवार बच्चों का रखरखाव करे।
-वाहनों की अधिकतर गति सीमा सड़क पर 50 किमी प्रति घंटा से अधिक न हो।
-सभी स्कूली वाहनों के लिए स्कूल परिसर में ही पार्किंग की व्यवस्था हो, जहां से बच्चों को छोड़ा व लिया जाए।
-सभी वाहनों में फर्स्ट एड बाक्स होना चाहिए।
-बसों के पहियों पर रबड़ सोल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, टायर ओरिजनल होने चाहिए।
- स्कूली वाहनों पर स्कूल का नाम, रूट, टाइमिंग, मालिक का नाम, पुलिस कंट्रोल रूम नंबर, चाइल्डलाइन नंबर जरूर डिसप्ले होना चाहिए।
-कंडेक्टर और चालक के लिए तीन साल में एक बार रिफ्रेशर कोर्स ट्रांसपोर्ट विभाग द्वारा करवाया जाना चाहिए।
-स्कूली वाहन चालक व कंडक्टर का सिविल सर्जन कार्यालय से फिटनेस प्रमाण पत्र तीन साल में एक बार जरूर रिन्यू होना चाहिए।
-स्कूल वाहन चालक व कंडेक्टर का यूनिफार्म में होना जरूरी है, जिस पर नेमप्लेट व लाइसेंस नंबर लिखा हो।
-स्कूल वाहनों में सिटिंग कैपेसिटी से डेढ़ गुना से ज्यादा बच्चे सवार नहीं होने चाहिए।
-स्कूल परिसर व इसके आसपास संस्थान का ही व्यक्ति इन बसों के लिए ट्रैफिक कंट्रोल करेगा। 
-स्कूली वाहनों के शीशे पर किसी भी प्रकार का परदा इत्यादि न हो, बच्चों के बैठने की सीटें फटी न हो और भीतर का माहौल गंदा व बदबूदार न हो।
-1.4.2014 के बाद बच्चों को ले जाने के लिए रजिस्टर्ड किया गया स्कूली वाहनों में जीपीएस लगा होना अनिवार्य होगा।
-स्कूली वाहन चलाने वाले चालक व परिचालक की पुलिस वेरीफिकेशन भी जरूरी है।


निरीक्षण में ये सामने आई थी खामियां
आयोग ने प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में जो निरीक्षण किया था, उसमें कई तरह की अनियमितताएं सामने आई थी। अधिकतर वाहनों में तो सीसीटीवी कैमरे नहीं थे। जिनमें थे, उनमें 50 दिन की रिकार्डिंग सेव नहीं थी। इसी तरह वाहन चालकों व कंडेक्टर के पास हेल्थ फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं थी और न ही उनकी पुलिस वेरीफिकेशन हो रखी थी। अधिकतर बसों की आरसी एक्पायर हो चुकी थी, उन बसों की हालत जर्जर हो चुकी थी, सीटें फटी थी, बसों के बीचे नीचे फर्श का बेस उखड़ रहा था और पहियों पर रबड़ सोल चढ़ाकर पहियों को बस धकेला ही जा रहा था। जबकि स्कूली वाहनों पर चाइल्डलाइन नंबर भी अंकित नहीं था, वाहन चालकों व परिचालक बिना वर्दी थे, न तो नेमप्लेट थी और न लाइसेंस नंबर कहीं अंकित था। इसी तरह की तमाम अनियमितताओं की रिपोर्ट आयोग हाईकोर्ट को सौंप चुका है।


साहा हादसा याद कर सिंहर जाते हैं अंबालवी
एटा से एक बड़ा हादसा अंबाला भी झेल चुका है। 2 जनवरी 2012 को साहा-शाहबाद हाइवे पर एक प्राइवेट स्कूल की खचाखच भरा स्कूली वाहन ट्रक से टकरा गया था। इस वाहन में छात्रों की बैठने की क्षमता तो 14 थी, लेकिन वाहन (टाटा मैजिक) में ठूंस रखे थे 33 बच्चे। सुबह के वक्त कोहरा जबरदस्त था, एक तेज रफ्तार ट्रक इस वाहन से टकरा गया। इस हादसे में मौके पर 14 बच्चों की जान गई थी, जबकि 3 बच्चों ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था। वर्ष 2015 में अदालत ने इस मामले में स्कूल प्रबंधक व प्राचार्य को सजा सुनाई थी। लेकिन उसके बावजूद भी आज भी हालातों में सुधार नहीं हुआ है। आज भी अंबाला के बाशिंदे इस हादसे को याद कर सिंहर जाते हैं।

स्कूली वाहनों को लेकर आरटीए विभाग पूरी तरह से सचेत है। बिना नियमों को चेक किए पासिंग ही नहीं होती। जो कमेटियां बनी हुई है, वो भी समय-समय पर स्कूली बसों को रोककर चेकिंग करती है। बच्चों की जिंदगी को लेकर विभाग पूरी तरह से संजीदा है।
-सतीश कुमार, आरटीए, अंबाला

हाईकोर्ट ने आयोग पर इस मामले में एक बहुत बड़ा भरोसा जताया है। राज्य सरकार भी स्कूली वाहनों में सवार बच्चों की जिंदगियों को लेकर गंभीर है, लेकिन सुरक्षित स्कूल वाहन पॉलिसी के तहत जो निगरानी कमेटियां गठित की गई थी, वो निष्क्रिय है, जिस वजह से प्राइवेट स्कूल संचालक इस मामले में अपनी मनमानियां चलाते हैं। आयोग ने प्रदेश भर में एक हजार से ज्यादा स्कूली वाहन चेक किए थे, 90 फीसद अनफिट पाए गए, रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंप दी है। ये निगरानी कमेटी अपना काम करती, तो हाईकोर्ट को इस मामले में आयोग से ग्राउंड रिपोर्ट लेने की जरूरत न पड़ती। केस अभी भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
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-सरदार परमजीत सिंह बड़ौला, सदस्य, हरियाणा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग
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