बढ़ गई गैस की खपत, डाइट मनी भी रिवाइज नहीं हुई, खाद्य पदार्थों के बढ़ते रेट से भी परेशानी
अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला कैंट। मिड-डे मील में फ्लेवर्ड मिल्क की मात्रा बढ़ने के बाद जहां गैस सिलेंडर की खपत बढ़ रही है, वहीं अभी तक डाइट मनी भी रिवाइज नहीं की गई है। मिल्क को मिड डे मील में शामिल तो किया गया है, लेकिन गैस सिलिंडर को लेकर स्कूल जूझ रहे हैं, क्योंकि खपत बढ़ रही है। दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत खाद्य पदार्थों की बढ़ती व घटती कीमतों को लेकर है, जिसे एडजस्ट करना मुश्किल हो रहा है।
मिड डे मील के तहत करीब 16 आइटम्स शामिल किए गए हैं, जो बच्चों को खिलाए जाते हैं। प्राइमरी स्तर पर चार रुपये 13 पैसे प्रति विद्यार्थी तथा मिडिल स्तर पर यह राशि करीब 6.18 रुपये प्रति विद्यार्थी तय की गई है। इसी राशि के अनुसार विद्यार्थियों के लिए खाद्य सामग्री लानी होती है, ताकि मिड डे मील बनाया जा सके। अब सबसे ज्यादा दिक्कतें गैस सिलिंडर को लेकर आ रही है। सप्ताह में तीन दिन फ्लेवर्ड मिल्क विद्यार्थियों को दिया जाता है, जबकि खाना भी उस दिन बनाया जाता है। इस कारण से महीने में बारह दिनों तक उसी गैस सिलिंडर से काम चलाना पड़ता है, जितना पहले था। ऐसे में गैस सिलिंडर की खपत बढ़ रही है, जबकि इस पर कोई राहत नहीं है।
दूसरी ओर, मिड डे मील की कई आइटम्स ऐेसे हैं, जिनके दाम कभी घटते को कभी बढ़ते हैं। ऐसे में तय राशि में इसे नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है, जबकि जो डाइट मनी प्रति विद्यार्थी है, वह भी कम पड़ रही है। दूसरी ओर सरकार द्वारा डाइट मनी को हर साल रिवाइज किया जाता है, लेकिन अभी तक यह रिवाइज ही नहीं हो पाई है। जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह राशि कम पड़ रही है। इसी तरह जो डाइट मनी रखी गई है वह फ्यूल के साथ ही है यानी सिलिंडर की राशि भी इसी में से निकालनी है। ऐसे में सिलिंडर की सात सौ रुपये का आ जाता है, जबकि इसके अलावा राशि कम बचती है।
मिड डे मील में बच्चों को खाना खिलाया जाता है, जो सरकार की अच्छी योजना है। लेकिन इसमें कई परेशानियां हैं, जिससे अध्यापक जूझ रहे हैं। यदि यह दूर हो जाती है, तो काफी राहत मिलेगी।
- तरविंदर शर्मा, ब्लाक प्रधान, राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ बराड़ा
मिड डे मिल योजना के तहत अधिकतर स्कूलों में परेशानी हो रही है। अब फ्लेवर्ड मिल्क तो जोड़ा गया है, लेकिन फ्यूल के लिए एडजस्टमेंट ही करनी पड़ती है। ऐसे में सिलिंडर की खपत तो बढ़ रही है। दूसरा सब्जियों आदि के रेट बढ़ने पर एडजस्ट करना और भी अधिक मुश्किल हो जाता है।
- मोहन लाल परोचा, महासचिव, राजकीय अनुसूचित जाति अध्यापक संघ अंबाला