कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने देश में जमकर तबाही मचाई। इसने लाखों लोगों की जिंदगियां लील ली। स्थिति इतनी विकराल हो गई थी कि शमशान घाटों में शवों का दाह संस्कार करने के लिए लोगों को कई-कई घंटों का इंतजार करना पड़ता था। इस दौरान, गंगा में उतराते सैकड़ों शव मिले, जिन्हें लेकर सरकार की जमकर आलोचना हुई।
गंगा नदी में कोरोना मरीजों के उतराते शवों को लेकर हाल ही में गुजरात की एक कवयित्री पारुल खाखर ने एक कविता लिखी। इस कविता के लिए गुजरात में तमाम लोगों ने पारुल की आलोचना की है। गुजरात साहित्य अकादमी ने पारुल को साहित्यिक नक्सली बताया है।
कविता को माना केंद्र के खिलाफ दुष्प्रचार
गुजरात की कवयित्री पारुल खाखर ने हाल ही में केंद्र की आलोचना करते हुए अपनी कविता गंगा शव वाहिनी लिखी थी। इस कविता को केंद्र सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने के हथियार के रूप में बताते हुए कहा कि तमाम लोगों ने इसका विरोध किया था।
साहित्य अकादमी ने कहा- लोकतंत्र पर लांछन लगाया
गुजरात में साहित्य अकादमी ने इस कविता की निंदा करते हुए पारुल खाखर को साहित्यिक नक्सली बताया। पारुल की कविता पर निशाना साधते हुए अकादमी ने कहा कि इस कविता के जरिये समाज में आराजकता फैलाने का प्रयास किया गया है। ये व्यर्थ का आक्रोश है और इससे लोकतंतत्र और समाज पर लांछन लगाने का काम किया गया है।
बता दें कि कोरोना की दूसरी लहर के कहर के बीच बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश के तमाम इलाकों में गंगा नदी में शवों के उतराने की तस्वीरें सामने आईं थीं। वहीं प्रयागराज, उन्नाव और कुछ अन्य जिलों में रेत में शवों के दफनाने के मामले में उजागर हुए थे। कोविड मरीजों के साथ अमानवीयता का आरोप लगाते हुए विपक्ष ने सरकार को घेरा था। इसे लेकर देश के तमाम हिस्सों में विरोध के स्वर उठे थे।