साहित्य संवाद कार्यक्रम में मंच पर उपस्थित ममता कालिया व अन्य।
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साहित्य के दुनिया की बात हो और मंच पर ममता कालिया, ऋषिकेश सुलभ, नागेंद्र प्रताप और प्रभात रंजन जैसे ख्यातिलब्ध लेखक और पत्रकार हों तो नई-नई कहानियों और अनसुने किस्सों पर सभी का गोते लगाना लाजमी है।
तीसरे सत्र में ‘साहित्य के अंत:पुर’ पर वरिष्ठ पत्रकार नागेंद्र प्रताप ने कहा कि यों तो हम सबके अन्त:पुर हैं तो चर्चा में साहित्य का अंत:पुर ही क्यों? और अगर अंत: पुर में झांका जाए तो सिर्फ नकारात्मक रूप में ही क्यों झांका जाए। जब हम सकारात्मक सोच के साथ प्रवेश करते हैं तो आत्मीय और ऊर्जापूर्ण कहानियां मिलती हैं।
मशहूर नाटककार साहित्यकार ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि कला और साहित्य का अंत:पुर बहुत ही विविध है। लेखकों के अंत:पुर में झांकना थोड़ा मुश्किल काम है। हर जगह से केवल बुराई ही नहीं मिलती, अच्छाई की संभावना भी बनी रहती है। लेखकों के जीवन में भी ईर्ष्या, दु:ख, कलुषता सब होती है। क्योंकि वह भी एक मनुष्य ही होता है।
सत्र का संचालन कर रहे प्रभात रंजन ने अपने निजी अनुभव में सत्तर के दशक में होने वाले लेखकों के जमावड़े से जुड़े सवाल पूछे तो ममता कालिया ने यादों की पोटली खोल दी। कहा कि प्रयागराज में फकीरों के डेरे थे। हम सभी की सबसे बड़ी लग्जरी ग्रीन लेबल चाय होती थी। प्रयागराज में दोस्त और दुश्मन अलग-अलग नहीं रखते थे हम लोग। जो दोस्त होता था वही दुश्मन भी होता था।