बताया कि खास सावधानियां बरत कर और हीमोफीलिया प्रतिरोधक फैक्टर के जरिये इस बीमारी को नियंत्रित किया जाता है। इस बीमारी में आंत या दिमाग के हिस्से में होने वाले रक्तस्राव से जान भी जा सकती है। जोड़ो में सूजन के साथ जब इस बीमारी में अक्सर दर्द होता है तो यह आंतरिक रक्तस्राव के कारण होता है, जो आगे चल कर दिव्यांगता में परिवर्तित हो सकता है। यह बीमारी दो प्रकार की होती है। जिन लोगों में रक्त का थक्का जमाने वाले फैक्टर आठ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया ए होता है और जिनमें फैक्टर नौ की कमी होती है, उन्हें हीमोफीलिया बी होता है।
मरीज में जिस फैक्टर की कमी होती है, उसे इंजेक्शन के जरिये नस में दिया जाता है, ताकि रक्तस्राव न हो। इसके मरीजों के लिए सही समय पर इंजेक्शन लेना, नित्य आवश्यक व्यायाम करना, दांतों के बारे में शिक्षित करना, एचआईवी, हेपेटाइटिस बी व सी जैसी बीमारियों से बचाना आवश्यक है ।
नवजात में नहीं हो पाती हीमोफीलिया की पहचान
जिला महिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ अजय देवकुलियार का कहना है कि नवजात में हीमोफीलिया की पहचान नहीं हो पाती है, लेकिन जब वह दो से तीन महीने के हो जाते हैं तो पहचान हो जाती है। ऐसे बच्चों का जिला अस्पताल और बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इलाज होता है। हीमोफीलिया और इसके जैसे रक्तस्राव संबंधित विकारों से बचाव के लिए विटामिन-के का इंजेक्शन सभी नवजात को लगाया जाता है। यह इंजेक्शन सभी राजकीय स्वास्थ्य केंद्रों पर निशुल्क है ।
262 मरीज हीमोफीलिया के
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के 262 मरीज पंजीकृत हैं। इन मरीजों में 80 से 85 प्रतिशत मरीजों को फैक्टर आठ लगाया जाता है। जबकि, 15 से 20 प्रतिशत मरीजों को फैक्टर नौ लगाया जाता है। इनके अलावा एक हजार मरीजों में एक मरीज को फैक्टर सात लगाया जाता है। इस फैक्टर के मरीज जिले में न के बराबर हैं।