जानकारी के मुताबिक, बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के 229 मरीज पंजीकृत हैं, लेकिन इनका इलाज सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। अस्पताल में 10 बेड का हीमोफीलिया वार्ड तो बना है, लेकिन इलाज के लिए जरूरी फैक्टर उपलब्ध नहीं हो पाता है। इलाज में फैक्टर सात, आठ व नौ की सबसे अधिक जरूरत होती है।
मरीजों को रक्तस्राव होने पर जरूरत के मुताबिक दो से तीन इंजेक्शन लगाना पड़ता है। बीआरडी में यह निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। जबकि बाहर एक इंजेक्शन की कीमत तीन हजार रुपये से लेकर 12 हजार तक है। सबसे महंगा फैक्टर सात है। इसका रेट करीब 12 हजार के आसपास है। फैक्टर नौ के इंजेक्शन का रेट करीब आठ हजार और फैक्टर आठ के इंजेक्शन का रेट करीब तीन हजार रुपये है।
लड़कों को ज्यादा होती है बीमारी
बालरोग विशेषज्ञ डॉ राजेश गुप्ता ने बताया कि हीमोफीलिया बीमारी लड़कों में ज्यादा पाई जाती है। हर 10 हजार में एक पुरुष को यह बीमारी होती है। चोट लगने पर स्थिति गंभीर हो जाती है, क्योंकि चोट लगने पर खून का बहना बंद नहीं होता है। इससे मरीज की मौत भी हो सकती है। उन्होंने बताया कि हीमोफीलिया अनुवांशिक बीमारी है। रक्त में विशेष प्रोटीन की कमी होती है, जिसे क्लॉटिंग फैक्टर कहा जाता है। यह रक्त को जमाकर उसका बहना रोकता है। इससे मरीज में खून का थक्का जमाने वाला प्रोटीन फैक्टर नहीं बनता। इसकी वजह से चोट लगने पर लगातार खून बहता रहता है।
हीमोफीलिया के लक्षण
चोट लगने पर लंबे समय तक खून बहना, शरीर के किसी भी भाग पर बार-बार नीले चकत्ते पड़ना, सूजन के स्थान पर गर्माहट और चिनचिनाहट होना, मसूढ़ों या जीभ में चोट लगने पर लंबे समय तक खून रिसना, शरीर के जोड़ों, घुटनों, एड़ी, पेशाब के साथ खून आना आदि लक्षण हैं।