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Gorakhpur News: एनसीआर बंद हुआ तो दुश्मन को बताने लगे दोस्त...पर यह पैंतरा भी बेकार

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गोरखपुर। जिले में पीड़ित को इंसाफ देने के लिए पुलिस ने एनसीआर बंद सीधे एफआईआर दर्ज करने के फाॅर्मूले पर काम किया तो अब केस में फंसे लोग दुश्मन बने पड़ोसी का भी हाथ-पैर जोड़कर दोस्त बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, केस दर्ज होने के बाद चरित्र सत्यापन, असलहा लाइसेंस और बच्चे की नौकरी तक फंसने लगी है तो लोगों को दर्ज हुए मामूली केस की याद आ गई है। अब वह शपथ पत्र दिलाकर इसे खत्म कराने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, पुलिस भी थाने स्तर पर सुलह समझौते को बंद करके सीधे चार्जशीट भेजने का ही काम कर रही है, जिस वजह से लोग कोर्ट में शपथ पत्र दे रहे हैं। लेकिन, कोर्ट में यह प्रक्रिया इतनी आसान और कम समय में होने वाली नहीं है।
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करीब डेढ़ साल पहले केस दर्ज होने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने की शिकायत बढ़ने पर एसएसपी डॉ गौरव ग्रोवर ने जिले में एनसीआर को बंद कर सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी कर दिया। इसका फायदा यह हुआ कि कई बेगुनाह फंसे लोग विवेचना में बच भी गए। मसलन, पड़ोसी के विवाद में गुजरात में बैठे युवक को भी आरोपी बना दिया जाता था। अब केस दर्ज होने के बाद वह अपनी दलील देता है और पुलिस की जांच में गुजरात में होना साबित होने के बाद केस में नाम भी निकाल दिया जाता है। लेकिन, कई ऐसे लोग भी है, जो पड़ोसी से विवाद करते समय इसे मामूली समझने की गलती कर बैठे और पुलिस रिकॉर्ड में केस दर्ज हो गया। अब मारपीट, धमकी देने के मामलों में पुलिस केस दर्ज करती है, लेकिन गिरफ्तारी की धारा न होने की वजह से 151 का चालान करती है, फिर आरोपी बने लोग को लगता था कि वह बच गए। अब जब उनके चरित्र सत्यापन की जरूरत हो रही है तो पता चला रहा है कि नहीं बन सकता है, क्योंकि केस दर्ज है। अब इस तरह के फंसे लोग पड़ोसी को मनाते है कि किसी तरह से उनका केस खत्म हो जाए और फिर चरित्र उत्तम बन सके।
हाईकोर्ट से ला रहे आदेश, पत्नी के नाम बना दें चरित्र प्रमाण पत्र
अब पुलिस की सख्ती के बाद सबसे ज्यादा परेशानी ठेका या फिर दूसरे सरकारी काम के लिए फर्म का पंजीकरण कराने वाले लोगों की बढ़ी है। कई ऐसे लोग भी हैं, जो केस में आरोपी होने के बाद अपनी पत्नी के नाम पर पंजीकरण कराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पुलिस उसे भी रिजेक्ट कर देती है। क्योंकि सत्यापन में एक कॉलम यह भी होता है कि जिसका चरित्र उत्तम बताया जा रहा है, उसका करीबी रिश्तेदार पर केस है या नहीं। ऐसे में पत्नी का करीबी रिश्ता पति होता ही है और पुलिस इसे आधार बनाकर रिजेक्ट कर देती है। अब कई मामलों में लोग हाईकोर्ट जाकर आदेश लेकर आ रहे हैं कि दोषी साबित होने तक उन्हें मौका दिया जाए।
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एनसीआर और एफआईआर में यह अंतर
एनसीआर पहले दर्ज होता और वह रिकॉर्ड में रहता था। कोर्ट से आदेश होने पर ही विवेचना होती थी। नहीं तो पुलिस थाने पर सुलह समझौता कराकर खत्म करा देती थी। लेकिन, एफआईआर में ऐसा नहीं होता है। एफआईआर दर्ज होने के बाद विवेचना बिना किसी आदेश के शुरू हो जाती है और जो सही होता है सामने आ जाता है। अगर, किसी को फंसाया गया होता तो उसे भी न्याय मिल जाता है। नहीं तो पहले सत्यापन के समय एनसीआर की जानकारी होने के बाद ही पीड़ित को पता चल पाता था।
केस एक
नहीं जा पा रहे विदेश
रुस्तमपुर निवासी अर्जुन पांडेय एक फर्म चलाते हैं। पड़ोसी से विवाद के बाद एक साल पहले धमकी देने का केस दर्ज हो गया। तब ध्यान नहीं दिए। अब फर्म का पंजीकरण रिश्तेदार के नाम पर कराना पड़ा है। उन्हें लगा काम तो चल ही रहा है, लेकिन अब जब पासपोर्ट के लिए आवेदन किए और रिजेक्ट हो गया तो पड़ोसी को रोज मनाते है। शपथ पत्र भी ले लिया है और कोर्ट में इसे दाखिल कराकर खत्म कराने की कोशिश में जुटे हैं।

केस दो
फंस गई है नौकरी
शाहपुर के रहने वाले राहुल सिंह पर भी मारपीट का एक केस दर्ज है। वह एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं और अब मार्च में उन्हें कंपनी में फिर से यह शपथ पत्र देना है कि उनके ऊपर कोई केस दर्ज नहीं है। लेकिन, इसके लिए जब उन्होंने आवेदन किया तो पता चला कि उनके खिलाफ गाली-गलौच का केस दर्ज है। अब उनकी दिक्कत यह कि नौकरी ही चली जाएगी। इसके लिए वह पीड़ित के संपर्क में हैं।
पीड़ित को न्याय देना ही पुलिस का काम है। इसी वजह से अब हर मामले में गोरखपुर पुलिस केस दर्ज कर जांच करती है। साक्ष्यों के आधार पर ही कार्रवाई की जाती है। अगर केस फर्जी दर्ज कराया गया होता है तो खत्म होता है, नहीं तो कानूनी कार्रवाई की जाती है।
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डॉ गौरव ग्रोवर, एसएसपी
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