गोरखपुर। किसी भाषा के निर्माण की प्रक्रिया मातृभाषा से शुरू होती है। बाद में यही मातृभाषा अन्य भाषाओंं के लिए संपर्क भाषा बनने का मार्ग प्रशस्त करती है। भारत के इतिहासकारों ने भोजपुरी का जिक्र नहीं किया है, जबकि यह पूर्वांचल की भाषा एवं पहचान है।
ये बातें दीनदयाल उपाध्याय गाेरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर आयोजित मातृभाषा भोजपुरी का मूल्य और महत्व विषयक विशिष्ट व्याख्यान कार्यक्रम में प्रो. विमलेश कुमार मिश्र ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि साहित्य और संस्कृति को जानने के लिए भाषा ज्ञान जरूरी है। आज भी गांवों में भोजपुरी का वजूद बना हुआ है। अवधी और ब्रजी की तरह भोजपुरी भी लोकभाषा है। लेकिन अवधी और ब्रजी जैसा इसका साहित्य नहीं है। गिरमिटिया मजदूर भोजपुरी को विदेशों में ले गये तो यह भाषा वहां की सभ्यता-संस्कृति का हिस्सा बन गई। जबकि, भारत के इतिहासकारों ने भोजपुरी का जिक्र नहीं किया। जबकि भोजपुरी पूर्वांचल की भाषा एवं पहचान है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. दीपक त्यागी और संचालन डाॅ. अभिषेक शुक्ल ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डाॅ. प्रियंका नायर ने किया। कार्यक्रम में हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग के प्रो. अनिल राय, प्रो. राजेश कुमार मल्ल, डाॅ. नरेंद्र कुमार, डाॅ. राम नरेश राम, डाॅ. रजनीश चतुर्वेदी, आयुष सेंगर, डाॅ. नरगिस बानो सहित तमाम लोग मौजूद रहे।