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Utpanna ekadashi 2020: इस वजह से सबसे खास माना जाता है उत्पन्ना एकादशी व्रत, जानिए कब हुई थी देवी की उत्पत्ति

Fri, 11 Dec 2020 01:59 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।
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उत्पन्ना एकादशी 2020। - फोटो : अमर उजाला
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उत्पन्ना एकादशी व्रत पर्व आज मनाया जा रहा है। पद्मपुराण के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने से सभी व्रतों का फल मिलता है। सभी प्रकार के दुखों का नाश होता है और श्रद्धालु को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वाराणसी से प्रकाशित हृषिकेश पंचांग के अनुसार इस दिन स्वाती नक्षत्र और शोभन नामक योग है। चंद्रमा शुभ राशि तुला पर स्थित है। प्रातः एकादशी और द्वादशी दोनों तिथियों की स्थिति होने से आज का दिन इस व्रत के लिए उत्तम है।
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व्रत का माहात्म्य
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार इस एकादशी का माहात्म्य अनेक पुराणों मे वर्णित है। इस दिन के उपवास से सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है। इस दिन दिया गया दान सहस्त्र गुना होकर प्राप्त होता है। इस एकादशी के माहात्म्य को श्रवण करने से सहस्त्र गोदान का फल प्राप्त होता है। इस दिन परोपकारिणी एकादशी देवी का जन्म होने के कारण व्रत करके भगवत कीर्तनादि करने का विशेष माहात्म्य माना जाता है।
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एकादशी व्रत पूजन विधि

ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार यह व्रत मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। व्रती को दशमी के दिन रात को भोजन नहीं करना चाहिए। एकादशी व्रत के दिन ब्रह्मबेला मे उठकर दैनिक कर्म स्नानादि से निवृत होकर भगवान श्रीकृष्ण को जल, चंदन, धूप, रोली, अक्षत आदि से विधिवत पूजन करें। व्रती को एकादशी के दिन व्रत रखकर केवल फलाहार करना चाहिए। इस दिन अन्न का सेवन वर्जित किया गया है। भगवान को केवल फलों का ही भोग लगाने का विधान है। भोग का प्रसाद भक्तों मे वितरित कर दें।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा
पंडित अरविंद गिरि के अनुसार सतयुग में मुर नामक एक बलशाली दैत्य हुआ। उसने युद्ध में समस्त देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। सभी देवता घबरा कर भगवान विष्णु की शरण में गए। उस बलशाली दैत्य से मुक्ति दिलाने के लिए श्रीहरि से प्रार्थना की। तब उन्होंने अनेक शस्त्रों के साथ स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया और वहां महाबलशाली मुर को युद्ध के लिए ललकारा। तब वह दैत्य भी अपनी सेना लेकर मुकाबले के लिए पहुंचा। घमासान युद्ध हुआ। देवगण युद्ध मे हारने लगे उसी समय भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या उत्पन्न हुई और समस्त दैत्यगण उस पर मोहित हो गए। युद्ध विद्या मे कुशल वह कन्या मुर को युद्ध के लिए ललकारी और उन दैत्यों के साथ युद्ध कर उन्हें मार डाला। जब भगवान विष्णु की तन्द्रा भंग हुई तो उन्हें मुर सहित समस्त दैत्यों की मृत्यु से बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने उस कन्या से वरदान मांगने के लिए कहा। कन्या ने कहा-भगवन वर ही देना चाहते हैं तो मुझे यह वर दीजिए, पहला तो मैं तीनों लोकों में, मन्वन्तरों में, युगों में सदा आपकी प्रिय बनी रहूं। दूसरा यह कि मैं सभी विघ्नों और पापों को नष्ट करने वाली, सब तिथियों में प्रधान तिथि एवं आयु और बल को बढ़ाने वाली रहूं। तीसरा यह कि जो लोग मेरे व्रत को भक्तिपूर्वक करें और उपवास करें, तो उन्हें सब प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हों। यह सुनकर भगवान विष्णु ने कहा कि जो वरदान तुमने मांगे हैं, वे सभी सत्य होंगे। जो भक्त तुम्हारे और मेरे निमित्त सच्चे मन और सच्चे भाव से उपवास रखेंगे, वे चारों युगों में प्रसिद्ध होकर विष्णु लोक पहुंचेंगे। इसके अतिरिक्त तुम सभी तिथियों मे उत्तम मानी जाओगी। यह सुनकर वह एकादशी व्रत कन्या बहुत प्रसन्न हुई और मुदित मन से चली गईं। तभी से एकादशी व्रत की प्रथा प्रारंभ हुई।
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