गोरखपुर विश्वविद्यालय में बवाल।
- फोटो : अमर उजाला।
ऐसा नहीं है कि छात्रों का गुस्सा शुक्रवार को अचानक भड़क गया। पिछले करीब एक महीने से विश्वविद्यालय प्रशासन व छात्र संगठन एबीवीपी के बीच रस्साकशी चल रही है। इसकी शुरुआत 26 जून को ही हो गई थी। छात्रों की फीस वृद्धि और परीक्षा परिणाम घोषित करने जैसे छात्रहित के मुद्दों को लेकर प्रशासनिक भवन में स्थित कुलपति कार्यालय के पास छात्र पहुंचे थे।
वह कुलपति से मिलना चाहते थे, लेकिन गेट पर ही रोक लिया गया था। अंदर से ताला बंद कर दिया गया। फिर छात्र गुस्से में आए और ताला तोड़कर अंदर दाखिल हो गए। एक के बाद एक कर तीन गेट का ताला तोड़े और प्रदर्शन किए। दो घंटे प्रदर्शन के बाद कुलपति ने मुलाकात की। एक-एक छात्रों की बातें भी सुनी और आश्वासन भी दिया था। लेकिन समय के साथ एक भी आश्वासन पर काम नहीं हुआ तो छात्र फिर 13 जुलाई को फिर से छात्रों ने पुरानी मांग को लेकर मुख्य गेट पर प्रदर्शन कर कुलपति का पुतला फूंका गया।
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इस दौरान मुख्य नियंता डॉ. सत्यपाल सिंह रोकने को पहुंचे थे, जिसे लेकर झड़प भी हुई थी। लेकिन समाधान इसके बाद भी निकल नहीं सका। छात्रों की इस हरकत के बाद नाराज विश्वविद्यालय प्रशासन ने 15 जुलाई को चार छात्रों को निलंबित कर दिया और बाहरियों के प्रवेश पर रोक लगा दी। अब छात्रों की मांग में निलंबन को वापस लेने की मांग बढ़ गई।
इसके बाद 18 जुलाई से छात्र धरने पर बैठ गए। रोजाना दो घंटे धरने पर बैठकर एबीवीपी से जुड़े छात्र यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी मांग मान ली जाए। मगर, ऐसा नहीं हुआ और शुक्रवार को गुस्सा इतना बढ़ गया कि विश्वविद्यालय के इतिहास में एक काला अध्याय जुड़ गया। झड़प तो कई बार हुई है, लेकिन जिस तरह से कुलपति व कुलसचिव के साथ मारपीट हुई है, शायद अपने आप में यह पहली बार हुआ है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय में बवाल
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