उल्कापिंडों की बरसात का दिखेगा मनमोहक नजारा
गोरखपुर। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए मंगलवार और बुधवार की रात बेहद आकर्षक होगी। उन्हें देर रात 12 से एक बजे के बीच उल्कापिंडों की आतिशबाजी देखने का मौका मिल सकेगा। इस अनोखी खगोलीय घटना को 28 और 29 जुलाई की रात में देख सकते हैं।
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला के खगोलविद् अमर पाल सिंह ने बताया कि सोलर सिस्टम के निर्माण के दौरान जो छोटे खगोलीय पिंड बड़े ग्रह बनने से बच गए थे, वे सभी ग्रह और धरती की तरह ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं। उन्हें ही विज्ञान की भाषा में उल्कापिंड या टूटता हुआ तारा कहा जाता है। ये लोहा, सिलिका, निकिल, सिलिकेट से बने होते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर जब सूर्य का चक्कर लगा रही होती है तो उस दौरान सोलर सिस्टम में मौजूद छोटे खगोलपिंडों के मलबे वायुमंडल में घुसने की कोशिश करते हैं। वायुमंडल में प्रवेश के दौरान ये घर्षण की वजह से जलने लगते हैं। जिसकी वजह से यह नजारा देखने लायक होता है।
चांद का आकार होगा कम, नजारे साफ दिखेंगे
खगोलविद् ने बताया कि चांद का आकार 66 फीसदी होने के कारण उल्कावृष्टि के नजारे को चंद्रमा के अस्त होने के बाद बखूबी देखा जा सकेगा। कोरोना महामारी के चलते प्रदूषण का स्तर भी घटा है। इससे आकाश में होने वाली ये खगोलीय घटना और साफ नजर आने लगेगी। इससे पहले अप्रैल के महीने में कई दिनों तक आकाश में उल्कापिंडों की बारिश के नजारे देखने को मिले थे। बड़ी संख्या में लोगों ने आसमान में चमकदार रोशनी बिखरने वाली इस उल्का वर्षा का आनंद लिया था।