गोरखपुर। रघुपति सहाय ''फिराक गोरखपुरी'' की पहली रचना महज 17 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुई। ''लेने से ताजो-तख्त मिलता है, मांगे से भीख भी नहीं मिलती'' जैसी उनकी अजर-अमर पंक्तियां आज भी हर जुबां पर हैं।
28 अगस्त 1896 को जन्मे सुप्रसिद्ध शायर रघुपति सहाय ''फिराक गोरखपुरी'' की मंगलवार को 44वीं पुण्यतिथि (तीन मार्च 1982 को निधन) है। उनका जीवन विद्रोही तेवरों वाला रहा। फिराक गोरखपुरी अंग्रेजों के खिलाफ लड़े तो नौकरी छोड़कर और कांग्रेस से विद्रोह किया तो कांग्रेस छोड़ दिया। उन्होंने गांधी को पत्र लिखा- बंदगी से कभी नहीं मिलती, इस तरह जिंदगी नहीं मिलती। लेने से ताजो-तख्त मिलता है, मांगे से भीख भी नहीं मिलती। इन पंक्तियों के बाद उन्होंने आगे लिखा- मैं कांग्रेस से इस्तीफा देता हूं। गोला क्षेत्र के बनवारपार गांव में जन्में फिराक गोरखपुरी ने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी विषय से एमए टॉप किया था।
पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं फिराक गोरखपुरी की रचनाएं
फिराक गोरखपुरी की रचनाएं देश के कई विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हिंदी, संस्कृत और उर्दू साहित्य का इतिहास पाठ्यक्रम में उन्हें पढ़ाया जाता था। एनईपी में हिंदीतर भारतीय साहित्य का पेपर बना तो उर्दू से सिर्फ गालिब को रखा गया। उर्दू विभाग में बीए और एमए में गजल विधा के पाठ्यक्रमों में उनकी रचनाएं शामिल हैं। डीडीयू में उर्दू विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. महबूब हसन कहते हैं, फिराक गोरखपुरी ने उर्दू शायरी को नए आयाम दिए। उनकी गजलों में हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विविधता झलकती है।
सामाजिक यथार्थ से जुड़ी हैं रचनाएं
डीडीयू के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने बताया कि फिराक गोरखपुरी उर्दू काव्यधारा की प्रगतिशील चेतना के महत्वपूर्ण शायर थे। जीवन, समाज एवं संस्कृति के प्रति उनका दृष्टिकोण यथार्थवादी और आधुनिक है। उन्होंने ''''उर्दू भाषा और साहित्य का इतिहास'''' लिखा तो ''''बज्में- जिंदगी'''' और ''''रंगे- शायरी'''' नाम से उत्कृष्ट शायरी का संकलन किया। उनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ झलकता है।