फिल्मी जगत में असित सेन, अनुराग कश्यप, जिम्मी शेरगिल जैसी बड़ी शख्सियत पहचान की मोहताज नहीं हैं। ये सभी गोरखपुर में पैदा हुए और अदाकारी की बारीकियां सीखीं। कुछ ऐसे भी कलाकार हैं, जिन्होंने खुद की बदौलत संघर्षों के बीच मुंबई में एक अलग मुकाम बनाया है।
इन कलाकारों को गोरक्षनगरी में बुनियादी सुविधाएं नहीं मिली। मौजूद समय में भी हालात वैसे ही हैं। कहने को तो प्रेक्षागृृृह बन गया, लेकिन शुल्क इतना ज्यादा है कि एक आम कलाकार वहां कार्यक्रम करने की सोच भी नहीं सकता है। वह ऐसे-तैसे जुगाड़ करके किसी तरह अपनी कला को जिंदा रखे हैं। इन हालातों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि पंकज त्रिपाठी जैसा बड़ा कलाकार बनना है तो मानिए मुंबई ही जाना पड़ेगा।
तकरीबन 30 से 40 साल पहले इस शहर में ढेरों रंगमंच के कार्यक्रम आयोजित होते थे। यहां नाटक पसंदीदा विधाओं में से एक थी। लेकिन, कलाकारों को न तो संसाधन मिले और न ही प्रोत्साहन, जिसके अभाव में रंगमंच का यह दायरा सिमटता चला गया। बीते चार दशकों से कलाकारों की ओर से एक प्रेक्षागृह की मांग की जा रही थी।
मुख्यमंत्री के निर्देश पर गंभीरनाथ प्रेक्षागृह बना। वर्ष 2021 में इस प्रेक्षागृह का लोकार्पण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। लेकिन, उम्मीद के मुताबिक इसका शुल्क नहीं रखा गया, जिसके चलते इस प्रेक्षागृह में रंगमंच के आयोजन न होकर सरकारी कार्यक्रम ज्यादा होते हैं। कलाकारों को पूर्वाभ्यास के लिए अभी कोई बेहतर स्थान नहीं है।
प्रस्तावित फिल्म सिटी से है कालाकारों को आस
गोरखपुर में क्षेत्रीय फिल्म सिटी बनाने की योजना सरकार की प्राथमिकता में है। इसके लिए 100 एकड़ जमीन भी खोजी जा रही है। बीते दिनों लखनऊ में हुए इन्वेस्टर्स समिट में सांसद एवं फिल्म अभिनेता रवि किशन की पहल पर मुंबई के एक प्रोडेक्शन हाउस ने 500 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव दिया है। अब कलाकारों आस जगी है कि यह फिल्म सिटी बन जाए तो कलाकारों को यहीं अवसर मिल जाएगा। उन्हें मुंबई की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा। फिल्म सिटी के बनने से गोरखपुर ही नहीं पूर्वांचल के कलाकारों को मंच मिलने लगेगा।
ये सुविधाएं हों तो बने बात
कलाकारों का कहना है कि रंगमंच के लिए एक स्थायी प्रेक्षागृह की जरूरत है, जो केवल रंगमंच के लिए हो। गंभीरनाथ प्रेक्षागृह का शुल्क हमारे बजट में नहीं है। प्रेक्षागृह में थियेटर के लिहाज से डिजाइनिंग की जाए। साउंड, पर्दा,माइक, लाइट आदि संसाधनों से वह परिपूर्ण हो। अगर इस तरह के बुनियादी सुविधाएं मिल जाए तो बात बने।
शहर में मौजूद प्रेक्षागृह
गंभीरनाथ प्रेक्षागृह- छोटे हॉल का दाम 25 हजार व बड़े हॉल का 50 हजार
गोरखपुर विश्वविद्यालय में संवाद भवन-
35 हजार व दीक्षा भवन का 60 हजार
रेलवे प्रेक्षागृह : अभी प्रस्तावित, शुल्क तय नहीं
ये हैं शहर के कलाकार जो कमा रहे मुंबई में नाम
असित सेन, अनुराग कश्यप, जिम्मी शेरगिल, रवि दूबे के अलावा टीआरपी मामा से प्रसिद्ध पारितोष त्रिपाठी,सीपी भट्ट,पारितोष कुमार,ऋतु सिंह, भूमिकेश्वर सिंह, विजय सिंह, राकेश यादव, सतीश वर्मा, विवेक शुक्ला,आदित्य सेन, कल्याण सेन, दीपक चौहान,अमित मौर्य,अरूण चौधरी,धर्मेंद्र भारती, तुषार रूंगटा सहित कई कलाकार अपनी चमक बिखेर रहे हैं।
तीन अप्रैल को हिंदी रंगमंच दिवस है। इस अवसर पर सभी कलाकार नाटक का मंचन करना चाहते हैं। लेकिन, हमें कोई स्थान नहीं मिल रहा। जो उपलब्ध हैं, उनके शुल्क इतने ज्यादा हैं कि प्रायोजक के बाद भी उसका खर्च नहीं उठा पा रहे हैं। - राजेश राज, कलाकार
इतना बड़ा शहर है, यहां एक स्थायी ऑडिटोरियम नहीं है। रामायण कॉन्क्लेव जैसे बड़े सरकारी आयोजन भी प्रेक्षागृह में न होकर रैंपस सभागार में हुए। नाटक के लिए स्थायी जगह न होने से लोगों का जुड़ाव भी हमसे नहीं होता।- मनोज राय, कलाकार
पृथ्वीराज कपूर यहां कर चुके हैं नाट्य मंचन
कभी इस शहर में विलियम्सन थियेटर था, जो स्वतंत्रता के पहले का है। पृथ्वीराज कपूर जैसे बड़े कलाकार नाटक यहां नाटक करने आ चुके हैं। उन्होंने उस थियेटर की तारीफ भी की थी। किन्हीं कारणों के चलते वो थियेटर अब नहीं है। स्थायी स्थान न होने के चलते तभी से सभी कलाकार बिखर गए। जो लोग सीएम तक हमारी बात नहीं पहुंचा रहे वो हमारी पीड़ा नहीं समझा पा रहें हैं।- श्रीनारायण पांडेय, अभियान थियेटर ग्रुप
ये हमारा दुर्भाग्य है कि लंबे समय की लड़ाई के बाद हमें एक प्रेक्षागृह तो मिला लेकिन, हम उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहें हैं। मंच न होने के चलते हमें मंचन में साउंड और लाइट को लेकर समझौता करना पड़ रहा है। इस कारण हमारे नाटक का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा है।
- मानवेंद्र त्रिपाठी , कलाकार
अगर सभी रंगकर्मी एक साथ मिलकर कुछ करना चाहते हैं तो स्थान की वजह से वह मुमकिन नहीं होता। कुछ सृजनात्मक करने के लिए अगर युवा आगे आते हैं तो उनकी यह दुर्दशा होती है।
- अजीत प्रताप सिंह, रंगकर्मी
कलाकारों की ओर से लंबे वक्त से प्रेक्षागृह की मांग की जा रही है। इसको लेकर रंगाश्रम की ओर से सांस्कृतिक आंदोलन नाटक के रूप में हर शनिवार को किया जा रहा था। कोरोना के बाद स्वास्थ्य कारणों के चलते यह नियमित करना मुश्किल हो रहा है। लेकिन, कोशिश जारी है।
- केसी सेन, वरिष्ठ रंगकर्मी
प्रेक्षागृह को लेकर तो मांग दशकों से हो रही है। इसके अलावा कलाकारों को भी ध्यान देना होगा कि लोगों की पसंद के मुताबिक विषय बदलकर नाटक दिखाने की जरूरत है।
- अशोक महर्षि, वरिष्ठ रंगकर्मी