- पूर्णिमा की रात में होलिका जलने की है परंपरा, दो मार्च की रात में जलेगी होलिका
गोरखपुर। वाराणसी से प्रकाशित हृषिकेश पंचांग के अनुसार, इस वर्ष होलिका दहन का शुभ मुहूर्त पूर्णिमा में दो मार्च की मध्य रात्रि में है। चार मार्च को चैत्र कृष्ण प्रतिपदा में होली मनाई जाएगी।
बेतियाहाता हनुमान मंदिर के महंत आचार्य रामनारायण त्रिपाठी ने बताया कि दो मार्च, सोमवार को सूर्योदय छह बजकर 16 मिनट पर होगा। चतुर्दशी तिथि सायं पांच बजकर 18 मिनट तक रहेगी, इसके पश्चात पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी। इस दिन आश्लेषा नक्षत्र सुबह सात बजकर 24 मिनट तक रहेगा। इसके बाद मघा नक्षत्र का प्रारंभ होगा। अतिगंड योग दिन में 12 बजकर 6 मिनट तक रहेगा, इसके बाद सुकर्मा योग प्रभावी होगा। साथ ही सौम्य नामक औदायिक योग भी रहेगा। पूर्णिमा तिथि तीन मार्च को सायंकाल चार बजकर 33 मिनट तक रहेगी।
ज्योतिषाचार्य जोखन पांडेय ने बताया कि होलिका पूजन और दहन पूर्णिमा तिथि में तथा भद्रा रहित रात्रि में किया जाना चाहिए। पंचांग के अनुसार, दो मार्च को सायं पांच बजकर 18 मिनट से भद्रा प्रारंभ होकर तीन मार्च प्रातः चार बजकर 56 मिनट तक रहेगी। इस प्रकार दो मार्च की संपूर्ण रात्रि भद्रा का प्रभाव रहेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि रात्रि में भद्रा व्याप्त हो तो भद्रा के पुच्छ भाग में होलिका दहन करना शुभ माना गया है। इस वर्ष भद्रा का पुच्छ काल रात्रि 12 बजकर 50 मिनट से दो बजकर दो मिनट तक रहेगा। यही एक घंटा 12 मिनट की अवधि होलिका दहन के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त मानी गई है। तीन मार्च को स्नान-दान की पूर्णिमा मनाई जाएगी। वहीं मधुमास (चैत्र मास) में मनाई जाने वाली रंगभरी होली चार मार्च, बुधवार को सूर्योदय कालीन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के अवसर पर मनाई जाएगी। धार्मिक विद्वानों ने श्रद्धालुओं से शास्त्रसम्मत मुहूर्त में ही होलिका दहन करने की अपील की है।
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बुजुर्गों ने कहा-पहले भी होलिका व होली के दिन हुआ है एक दिन का अंतर
इस बार होलिका दहन दो व होली चार मार्च को है। ऐसे में पहले के लोग बताते हैं कि ऐसा कई बार हुआ है। सिविल लाइंस की पास रहने वाली रेनुका त्रिपाठी बताती हैं कि ऐसा तिथियों के न मिलने के कारण होता है। सभी लोग इसको नहीं जान पाते हैं। पहले एक दिन होली में अंतर (गैप) होता था तो बच्चे अगले दिन होली खेल लेते थे, फिर होली के दिन भी होली खेलते थे। पकवान बनाकर देवताओं को अर्पण करने व रंग गुलाल देवताओं को चढ़ाने का कार्य होली के दिन ही होता है। एक दिन अंतर से इस बार पकवान बनाने का एक दिन समय भी मिल जाएगा।