उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक से बीतचीत करते प्रो हर्ष सिन्हा
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उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक ने कहा कि लेखक भले बूढ़ा हो जाए, किरदार कभी बूढ़ा नहीं होता। कहानी की निरंतरता अगर बनी रहती है तो वह पात्रों को रोके रखती है। पात्र कथाकाल के हिसाब से जवान ही बने रहते हैं।
वह रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल के 'गुफ्तगू' सत्र में प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा से संवाद कर रहे थे। 'पल्प फिक्शन बनाम साहित्य : क्या यह विभाजन आवश्यक है?' विषय पर चर्चा में उन्होंने कहा कि कहानी पहले पैराग्राफ से शुरू हो जानी चाहिए और पाठक को बांधकर रखना कहानी का मूल होना चाहिए। छोटे चरित्र भी महत्वपूर्ण और प्रभावी होंगे तभी वह पाठक को प्रभावित करेंगे।
उन्होंने कहा कि, वह साहित्यकार नहीं, कारोबारी लेखक हैं। कहानी लिखते हैं, कंटेंट में तर्क डालने या वैज्ञानिक अप्रोच के लिए वह विशेषज्ञों से मशविरा करते हैं। लेखक की सोच उसके चरित्रों में भी झलकती ही है। पाठकों की रुचि को बनाए रखने के लिए उपन्यासों में अलग-अलग किरदारों को गढ़ा।
उन्होंने कहा कि, आज के समय में लेखकों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी शैली और कथानक को कॉपी किया जा रहा है। उन्हें भी इसके खिलाफ दो बार अदालत जाना पड़ा है, मुकदमे लड़ने पड़े हैं। उन्होंने कहा कि कामयाबी सीढ़ी चढ़ने का नाम है। कामयाबी के लिए कोई लिफ्ट नहीं होती जो पहली से सीधे दसवीं मंजिल पर पहुंचा दे।