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संतकबीरनगर: इस शहीद सपूत ने कश्मीर में लिखी थी शौर्य गाथा, लश्कर के तीन आतंकियों को सुला दिया था मौत की नींद

Mon, 22 Jun 2020 02:32 PM IST
प्राची प्रियम दीन दयाल शुक्ल, हरिहरपुर
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शहीद रामप्रीत चौरसिया - फोटो : अमर उजाला
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बीएसएफ की 52वीं बटालियन में तैनात रहे संतकबीरनगर जिले के शहीद रामप्रीत चौरसिया ने कश्मीर में आज से 17 साल पहले जो शौर्य गाथा लिखी थी वह आज भी लोगों की जुबां पर है। नाथनगर- महुली रोड पर बना शहीद का स्मारक उसकी बहादुरी की गवाही दे रहा है। इस राह से गुजरने वाला हर राहगीर शहीद के स्मारक को आज भी नमन करता है ।

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नाथनगर ब्लॉक के अलीनगर गांव निवासी रामप्रीत चौरसिया को बतौर सिपाही सन 1998 में बीएसएफ में नियुक्ति मिली थी। वो लगातार चीन की सीमा के दुर्गम इलाके में तैनात रहे। 2001 में उनकी तैनाती कश्मीर के पुलवामा में हुई । 16 सितंबर 2003 को पुलवामा के नरवानी गांव के एक घर में आतंकियों के छिपे होने की खुफिया सूचना मिली। 

इस ऑपरेशन की कमान बीएसएफ की 52वीं बटालियन को सौंपी गई। जिस टीम को सर्च आपरेशन के लिए भेजा गया था उसमें रामप्रीत चौरसिया भी शामिल थे। जब आतंकियों से मुठभेड़ में टीम के एएसआई और हेड कांस्टेबल बुरी तरह जख्मी हो गए तब रामप्रीत ने मोर्चा संभाला और घर में छिपे लश्कर के तीनों आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया। 
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इस मुठभेंड़ में आतंकियों की गोली से रामप्रीत भी बुरी तरह जख्मी हो गए और 17 सितंबर को सेना के अस्पताल में जीवन की जंग हार गए। जिस घर में आतंकी छिपे थे वहां से भारी मात्रा में हथियार और गोला बारूद भी बरामद हुआ था। खुफिया सूत्रों ने कश्मीर में बड़े आतंकी हमले का इनपुट दिया था, जिसे रामप्रीत चौरसिया ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए नाकाम कर दिया था। 

17 साल बीत गए, लेकिन शहीद रामप्रीत चौरसिया के साहस और वीरता की चर्चा आज भी क्षेत्र के गांवों में होती है।

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राष्ट्रपति पुलिस पदक मेडल फॉर गेलेंट्री अवार्ड से हुए थे सम्मानित

शहीद रामप्रीत चौरसिया को सन 2005 में मरणोपरांत तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर एपीजे कलाम पुलिस पदक मेडल फॉर गेलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया गया था । इस सम्मान को पाकर परिजनों ने खुद को गौरवान्वित महसूस किया। वहीं क्षेत्र के लोगों ने भी अपने शहीद बेटे को मिले इस पुरस्कार पर खुशी जताई थी ।    

शहीद के मासूमों के सर से एक के बाद एक उठता गया बड़ों का साया
जिस समय रामप्रीत चौरसिया शहीद हुए उस समय घर में बुजुर्ग माता-पिता के अलावा उनकी पत्नी कुशुमावती देवी और पांच मासूम बच्चे थे। सबसे बड़ा बेटा विनय उस समय 13 साल का था। बेटे की मौत के सदमे में एक साल बाद पिता ने भी दम तोड़ दिया। 

2010 में शहीद की पत्नी कुशुमावती देवी भी गंभीर बीमारी के चलते परिवार को छोड़ गईं। अब शहीद के बच्चों की जिम्मेदारी बुजुर्ग दादी के कंधों पर आ गई। शहीद की पत्नी की मौत के बाद परिवार को मिलने वाली पेंशन भी बंद हो गई। अब परिवार के भरण पोषण का संकट पैदा हो गया ।

छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी ने नौकरी से इस्तीफा देने को किया मजबूर
रामप्रीत चौरसिया के शहीद होने के 9 साल बाद बड़े बेटे विनय कुमार चौरसिया को बीएसएफ में नियुक्ति मिली, लेकिन छोटे भाई बहनों और बुजुर्ग दादी की जिम्मेदारी ने उन्हें नौकरी से इस्तीफा देने पर विवश कर दिया। अब एकमात्र खेती का सहारा बचा था। 

इसी से परिवार का भरण पोषण चलता रहा। आज भी शहीद रामप्रीत का परिवार आर्थिक परेशानी से जूझ रहा है। शहीद के बेटे विनय कुमार चौरसिया ने बताया कि आज उनके घर की माली हालत ठीक नहीं है। सहायता के लिए उन्होंने सूबे के सीएम को चिट्ठी भी लिखी थी। जांच करने पहुंचे स्थानीय प्रशासन के लोगों ने पता नहीं क्या रिपोर्ट भेजी कि उन्हें आजतक उसका जवाब नहीं मिला ।
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