शहीद रामप्रीत चौरसिया को सन 2005 में मरणोपरांत तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर एपीजे कलाम पुलिस पदक मेडल फॉर गेलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया गया था । इस सम्मान को पाकर परिजनों ने खुद को गौरवान्वित महसूस किया। वहीं क्षेत्र के लोगों ने भी अपने शहीद बेटे को मिले इस पुरस्कार पर खुशी जताई थी ।
शहीद के मासूमों के सर से एक के बाद एक उठता गया बड़ों का साया
जिस समय रामप्रीत चौरसिया शहीद हुए उस समय घर में बुजुर्ग माता-पिता के अलावा उनकी पत्नी कुशुमावती देवी और पांच मासूम बच्चे थे। सबसे बड़ा बेटा विनय उस समय 13 साल का था। बेटे की मौत के सदमे में एक साल बाद पिता ने भी दम तोड़ दिया।
2010 में शहीद की पत्नी कुशुमावती देवी भी गंभीर बीमारी के चलते परिवार को छोड़ गईं। अब शहीद के बच्चों की जिम्मेदारी बुजुर्ग दादी के कंधों पर आ गई। शहीद की पत्नी की मौत के बाद परिवार को मिलने वाली पेंशन भी बंद हो गई। अब परिवार के भरण पोषण का संकट पैदा हो गया ।
छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी ने नौकरी से इस्तीफा देने को किया मजबूर
रामप्रीत चौरसिया के शहीद होने के 9 साल बाद बड़े बेटे विनय कुमार चौरसिया को बीएसएफ में नियुक्ति मिली, लेकिन छोटे भाई बहनों और बुजुर्ग दादी की जिम्मेदारी ने उन्हें नौकरी से इस्तीफा देने पर विवश कर दिया। अब एकमात्र खेती का सहारा बचा था।
इसी से परिवार का भरण पोषण चलता रहा। आज भी शहीद रामप्रीत का परिवार आर्थिक परेशानी से जूझ रहा है। शहीद के बेटे विनय कुमार चौरसिया ने बताया कि आज उनके घर की माली हालत ठीक नहीं है। सहायता के लिए उन्होंने सूबे के सीएम को चिट्ठी भी लिखी थी। जांच करने पहुंचे स्थानीय प्रशासन के लोगों ने पता नहीं क्या रिपोर्ट भेजी कि उन्हें आजतक उसका जवाब नहीं मिला ।