राजकीय बौद्ध संग्रहालय में रखे प्राचीन सिक्कों के सांचे।
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इतिहास खुद को जानने और समझने के हजार मौके प्रदान करता है लेकिन ये हमारे ऊपर है कि हम उसे कितना समझ पाते हैं। उसी के सहारे हम अपने वर्तमान और फिर भविष्य को संवार पाते हैं। कुछ इसी मकसद से राजकीय बौद्ध संग्रहालय में तृतीय शताब्दी (कुषाण काल) से लेकर 13वीं शताब्दी तक की संरक्षित जैन, महावीर, बौद्ध स्तूप, मोहर, सिक्कों के सांचे सरीखी अन्य कलाकृतियों पर लिखे अभिलेखों को संरक्षित करने की कवायद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग लखनऊ की टीम ने शुरू कर दी है।
पुरालेखविद् डॉ. राजेश कन्नौजिया की अगुवाई में टीम पहुंची। मकसद है, हजारों वर्ष पुरानी कलाकृतियों के उस दौर के अनसुलझे राज का पता लगाना। इस जानकारी को वहां आने वाले दर्शकों को देने के साथ ही अनुसंधान के लिए भी इस्तेमाल की जा सकेगी।
राजकीय बौद्ध संग्रहालय के उपनिदेशक डॉ. मनोज गौतम ने बताया कि हजारों वर्ष पुरानी इन कलाकृतियों के बारे में पता लगाने में अहम भूमिका इन पर लिखे अभिलेखों के जरिए मिलती है। पुरातत्व विभाग की ओर से सैंपल जुटाया गया है। रिपोर्ट तैयार होते ही उसकी प्रतियों को यहां बौद्ध संग्रहालय में भी लगाया जाएगा।
ब्राह्मी, खरोष्ठी लिपियों में लिखे गए हैं अभिलेख
राजकीय बौद्ध संग्रहालय में जो कलाकृतियां संरक्षित है उनमें कई लिपियों में उस दौर से जुड़ी अहम जानकारियां उकेरी हुई हैं। इन्हें संरक्षित किया जा रहा है। कलाकृतियों पर ज्यादातर ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों में अभिलेख लिखे हुए हैं।