कृषि विज्ञान केंद्र बेलीपार के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसके तोमर का कहना है कि चने और मसूर की बुआई का समय 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक बेहतर होता है। यदि इस समय तक दोनों दलहनी फसलों की बुआई किसान कर लेते हैं तो बेहतर उपज मिल जाती है। विलंब होने पर पैदावार घटने लगती है। जिन किसानों को इन फसलों को बोना है, वे इनकी बुआई तय समय पर कर दें।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसके तोमर का कहना है कि बेहतर उपज पाने के लिए किसान चने की बुआई लाइन में करें। लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए। यदि किसान देसी चने की बुआई कर रहे हैं, तो एक हेक्टेयर में 75 किलोग्राम बीज का प्रयोग करें। यदि मध्यम स्तर का चना बो रहे हैं, तो 80 किलोग्राम बीज खेत में डालें। यदि काबुली चना बो रहे हैं, तो एक हेक्टेयर में 125 किलोग्राम बीज डालें। यदि बड़ा चना बो रहे हैं, तो 100 किलो बीज एक हेक्टेयर खेत में डालना चाहिए।
बीज उपचारित करके ही बोएं
बुआई से पहले इसका ध्यान रहे कि चने में बहुत से रोग लगते हैं। चने की फसल को रोग से बचाने के लिए बीज का शोधन जरूरी है। इसके लिए ट्राइकोडर्मा पाउडर को 6 ग्राम प्रति किलो बीज में डाल कर उपचारित कर लें।
कितनी खाद डालें
चने की बुआई के समय खेत में उर्वरक की मात्रा आवश्यकतानुसार डालनी चाहिए। एक हेक्टेयर खेत में 100 किलोग्राम डीएपी का प्रयोग करें। साथ ही 20 किलोग्राम सल्फर का प्रयोग करें।
चने की उन्नत प्रजातियां
गुजरात चना 4, पूसा 391, जेजी 16, जेबीजे 202, पूसा चमत्कार, पूसा-1008 हैं।
मसूर की बेहतर प्रजातियां
डॉ. तोमर ने बताया कि मसूर की बेहतर प्रजातियों में पीएल 8 एपी 717, नरेंद्र मसूर, एपीएल 315 हैं। मसूर की बुआई के लिए किसान इस बात का ध्यान रखें कि एक हेक्टेयर में 40 किलो बीज का प्रयोग करें। बुआई लाइन से करें। लाइन से लाइन की दूरी 25 सेमी होनी चाहिए। मसूर में उर्वरक का प्रयोग चने के समान ही करना है।