बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी विभाग के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव तकनीक को इसलिए बेहतर माना जाता है, क्योंकि इसमें मरीज को ज्यादा दर्द नहीं होता और न ही चीरा और टांका लगाना पड़ता है। बस मरीजों को एक हल्का झटका सहना होता है, जो ज्यादा दर्द नहीं देता।
बताया कि अक्सर देखा गया है कि मरीज के अर्टरी में बार-बार कैल्शियम (ब्लॉकेज) जमा हो जाता है और उसमें डाले गए स्टेंट (छल्ला) कैल्शियम के कारण टूट जाते हैं। ऐसे मरीजों को सीधे बाईपास सर्जरी करानी पड़ती है। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। अगर बाईपास सर्जरी नहीं हुई तो मरीज की मौत तय है। लेकिन इस तकनीक ने इसे बेहद कम कर दिया है।
70 से 80 फीसदी गंभीर को ज्यादा दर्द मरीजों को शॉकवेव इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक के जरिये कोरोनरी आर्टरी डिजीज के गंभीर मरीजों के कैल्शियम को तोड़ा जाता है। इसके बाद उसी तार के जरिये स्टेंट डाल दिया जाता है। इसके बाद ब्लॉकेज की आशंका महज 15 से 20 प्रतिशत ही रह जाती है।
डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव के अलावा दो और तकनीक से कैल्शियम तोड़े जाते हैं। पहली लेजर एथरेक्टॉमी तकनीक है। इस तकनीक में धमनियों की दिवालों को क्षति पहुंचने की आशंका रहती है। इसी तरह रोटाब्लेशन तकनीक है। इसमें रोटाब्लेटर का उपयोग एक तरह की कैथेटर-आधारित आशंका प्रक्रिया में किया जाता है। इसमें दर्द ज्यादा होता है