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30 दिनों में अग्रिम जमानत का निस्तारण अनिवार्य : न्यायमूर्ति डीके सिंह

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गोरखपुर। अधिवक्ता परिषद उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड की ओर से वीकेएस चौधरी स्मृति ऑनलाइन व्याख्यानमाला शुरू की गई है। इसमें रविवार के वक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद (लखनऊ खंडपीठ) के न्यायमूर्ति डीके सिंह रहे। उन्होंने अग्रिम जमानत : एक विश्लेषण विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। इस व्याख्यान में गोरखपुर से भी अधिवक्ता जुड़े थे।
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न्यायमूर्ति ने कहा कि उत्तर प्रदेश में अग्रिम जमानत को इमरजेंसी के समय 1973 में खत्म कर दिया गया था। यह छह जून, 2019 से उत्तर प्रदेश में फिर से प्रभावी हुआ। जब किसी व्यक्ति को यह विश्वास है कि उसको किसी अजमानतीय अपराध में फंसाया जा सकता है या उसका नाम आ सकता है, पुलिस उसको गिरफ्तार कर सकती है तो वह सत्र न्यायालय में अंतरिम जमानत के लिए याचिका दाखिल कर सकता है। याचिका निस्तारण 30 दिन के अंदर किया जाना जरूरी है। इसके लिए याचिकाकर्ता की उपस्थिति जरूरी नहीं है, लेकिन जब पुलिस बुलाए तो उपस्थित होना होगा।
उन्होंने बताया कि अग्रिम जमानत आवेदन दो प्रकार से हो सकता है।
पहला एफआईआर होने से पूर्व और दूसरा एफआईआर के बाद। एससी-एसटी एक्ट, बलात्कार के मामले, पोक्सो एक्ट, नारकोटिक्स एक्ट व आतंकी गतिविधियों से संबंधित मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है। आरोपित को सात दिन पहले नोटिस भेजना अनिवार्य होगा। अग्रिम जमानत देने से पूर्व माननीय न्यायाधीश अभियोग की प्रकृति, गंभीरता, आवेदक का इतिहास व उसकी न्याय से भगाने की मंशा तो नहीं है, उसे भी देखेंगे।
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यदि कोर्ट अग्रिम जमानत शर्तों के साथ दे देता है तो पुलिस उस आवेदक को परेशान नहीं करेगी। अग्रिम जमानत का उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को आर्थिक हानि व सामाजिक बदनामी से बचने के लिए है। जब यह विश्वास है कि गलत व झूठ फंसाया गया है या रंजिशन फंसाया गया है। न्यायमूर्ति ने अनेक प्रतिपादित सिद्धांतों का भी वर्णन किया। कार्यक्रम का संचालन प्रवीण कुमार सिंह एडवोकेट ने किया।
लाइव प्रसारण में महेंद्र नाथ शुक्ल, अभयनंदन त्रिपाठी, उदयवीर सिंह, ब्रजेंद्र सिंह, कृष्णानंद तिवारी, अरुण कुमार पांडेय, बद्री दुबे, मनीष सिंह, अखिलेश दुबे, अजिता पांडेय, सरिता चतुर्वेदी, मोहिनी त्रिपाठी, संतोष सिंह, केके तिवारी, अभिनव त्रिपाठी आदि की उपस्थित रही।
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