शव का अंतिम संस्कार करतीं पुष्पलता सिंह
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जिन्हें लोग लावारिस कहते हैं, उनके अंतिम सफर की आखिरी साथी होती हैं अम्मा। मृतक का धर्म चाहे जो हो, अम्मा का धर्म तो इंसानियत है। तभी तो वह सूचना मिलते ही लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए पहुंच जाती हैं। मरने वाले के धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार करती हैं। लोग उन्हें लावारिसों की वारिस भी कहते हैं।
अम्मा का नाम है पुष्पलता सिंह। वह एक विज्ञान शिक्षिका हैं। वह बताती हैं कि दो साल पहले उन्होंने इस जिम्मेदारी को पूरा करने का बीड़ा उठाया था। उनकी इस यात्रा की शुरुआत 28 दिसंबर 2023 को हुई जब उन्हें सड़क किनारे एक अज्ञात बुजुर्ग गंभीर बीमारी से तड़पते दिखे। उस असहाय बुजुर्ग को कोई सहारा देने वाला नहीं था।
इसके बाद पुष्पलता उन्हें अपने घर ले आईं और एक साल तक उनकी सेवा और इलाज कराया। बुजुर्ग के निधन के बाद जब कोई भी उनका शव लेने नहीं आया तब पुष्पलता ने उनका अंतिम संस्कार किया। इस भावुक क्षण के बाद से पुष्पलता ने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई है। कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उन्हें पुलिस की ओर से शव सौंपे जाते हैं।
इसके बाद वह खुद राजघाट श्मशान या कब्रिस्तान जाती हैं और बिना डरे शवों का अंतिम संस्कार करती हैं। पुष्पलता ने बताया कि संसाधनों की कमी के कारण कई बार शवों को निजी वाहनों या ऑटो में लाना पड़ता है। वह मृतकों के अस्थि-कलश को भी सुरक्षित रखती हैं, विसर्जन भी करती हैं। कहती हैं कि अब तो लोग उन्हें फोन करके सूचनाएं देते हैं।
अपने इस कर्मयोग के बारे में पुष्पलता कहती हैं-
सच्ची इंसानियत न तो किसी जाति को देखती है और न ही किसी मजहब की बेड़ियों में बंधती है। जो लोग जीते-जी अपनों के प्यार और सहारे के लिए तरस गए, कम से कम मृत्यु के बाद तो वे एक सम्मानजनक विदाई के हकदार हैं।
श्मशान घाट की रूढ़ियों को तोड़ना मेरे लिए कोई शौक नहीं बल्कि उन अनाथ आत्माओं के प्रति एक मां और एक संतान का कर्तव्य है। जब तक मेरी सांसें चल रही हैं, मेरे एक हाथ में बच्चों का भविष्य संवारने के लिए कलम रहेगी और दूसरे हाथ में लावारिसों को मोक्ष दिलाने के लिए अग्नि।